उत्तराखंडराज्य

तिहरे हत्याकांड के दोषी की फांसी की सजा रद्द, उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; मानसिक बीमारी बनी अहम आधार

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए संजय सिंह को बड़ी राहत दी है। अदालत ने गुरुवार को अधीनस्थ अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा रद्द कर दी। न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने यह फैसला दोषी की मानसिक बीमारी से जुड़े पहलुओं पर विचार करने के बाद सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार को उसकी बीमारी का उचित इलाज कराने और स्वस्थ होने पर उसे रिहा करने का निर्देश दिया है।

मानसिक बीमारी के इलाज और रिहाई को लेकर निर्देश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि संजय सिंह की मानसिक बीमारी का समुचित उपचार कराया जाए। अदालत के आदेश के मुताबिक, उसके ठीक होने पर उसे रिहा किया जाए। सुनवाई के दौरान पीठ ने राज्य सरकार से दोषी से संबंधित रिकॉर्ड की जांच करने को कहा था। साथ ही यह पता लगाने का निर्देश दिया था कि वारदात के समय वह किसी गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित था या नहीं और क्या मौत की सजा सुनाते वक्त उसकी मानसिक स्थिति से जुड़े किसी महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया था।

2014 में तलवार से मां, भाई और गर्भवती भाभी की हत्या

यह मामला टिहरी जिले के गुमल गांव का है। संजय सिंह पर आरोप था कि उसने 13 दिसंबर 2014 को मामूली विवाद के बाद तलवार से अपनी मां, बड़े भाई और गर्भवती भाभी की हत्या कर दी थी। घटना के बाद उसके पिता राम सिंह पंवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इस तिहरे हत्याकांड में संजय सिंह को बाद में दोषी ठहराया गया और उसे मृत्युदंड सुनाया गया।

2021 में सुनाई गई थी फांसी की सजा

अगस्त 2021 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रमा पांडे की अदालत ने संजय सिंह को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इस फैसले को उसने उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले में दोषी की ओर से पक्ष रखने के लिए हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ को न्याय मित्र नियुक्त किया था।

मेडिकल बोर्ड ने मानसिक बीमारी की पुष्टि की

सुनवाई के दौरान न्याय मित्र अरविंद वशिष्ठ ने अदालत को बताया कि संजय सिंह मानसिक बीमारी से पीड़ित है। एक मेडिकल बोर्ड ने भी उसे मानसिक रूप से बीमार पाया था। बोर्ड के मुताबिक, वह अपने कार्यों के परिणामों को समझने में असमर्थ था। हालांकि, चिकित्सकीय आकलन में यह भी कहा गया कि उचित उपचार मिलने पर उसकी बीमारी ठीक हो सकती है। दोषी की ओर से दलील दी गई कि अधीनस्थ अदालत ने मृत्युदंड सुनाते समय मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण पहलू पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

पहले भी अधीनस्थ अदालत को वापस भेजा गया था मामला

इससे पहले हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए अधीनस्थ अदालत में भेजा था। इसका उद्देश्य मौत की सजा की पुष्टि से पहले दोषी की शारीरिक और मानसिक स्थिति की जांच कराना था। दोबारा सुनवाई के बाद अधीनस्थ अदालत ने कहा था कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे साबित हो कि वारदात के समय संजय सिंह किसी ऐसी बीमारी से प्रभावित था, जिसके कारण उसने अपराध किया। अदालत ने यह भी कहा था कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार सभी संबंधित तथ्यों पर विचार किया गया और पहले के फैसले में बदलाव का आधार नहीं मिला। इसके बाद मामला फिर हाईकोर्ट पहुंचा, जहां मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पहलुओं पर विचार करते हुए मौत की सजा रद्द कर दी गई।

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