150 मीटर की ऊंचाई से टैंक पर सीधा वार, 4.5 किमी दूर तक निशाना; जैवलिन मिसाइल से बढ़ेगी भारत की जमीनी ताकत

नई दिल्ली: भारत अपनी जमीनी युद्ध क्षमता को मजबूत करने के लिए अमेरिका से 45.7 मिलियन डॉलर की लागत से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल खरीदने जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश से लगी सीमाओं को देखते हुए यह प्रणाली भारतीय सुरक्षा बलों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। सेवानिवृत्त विंग कमांडर प्रफुल बख्शी ने कहा कि भारत की सीमाओं से जुड़े क्षेत्रों में बख्तरबंद वाहनों और टैंकों की भूमिका को देखते हुए एंटी-टैंक हथियारों की जरूरत अहम है।
उन्होंने कहा कि भारत 1965 और 1971 के युद्धों के साथ खेमकरण जैसी लड़ाइयों में टैंक युद्ध का सामना कर चुका है। इसके अलावा यूक्रेन और इराक के संघर्षों में भी टैंकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल देखा गया है। ऐसे में जमीनी युद्ध के दौरान दूर से बख्तरबंद लक्ष्यों को निशाना बनाने वाली मिसाइल प्रणालियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
4.5 किलोमीटर तक लक्ष्य भेदने की क्षमता
प्रफुल बख्शी के मुताबिक जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल करीब 4.5 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य साध सकती है। दुश्मन के टैंक के आगे बढ़ने की स्थिति में इसे अपेक्षाकृत दूर से दागकर निशाना बनाया जा सकता है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में हाई-अटैक मोड शामिल है, जिसमें मिसाइल लक्ष्य के ऊपर पहुंचकर ऊपर से नीचे की दिशा में प्रहार करती है।
उनके अनुसार मिसाइल करीब 150 मीटर की ऊंचाई तक जाकर सीधे नीचे की ओर लक्ष्य पर हमला कर सकती है। कुछ परिस्थितियों में इसकी यह क्षमता इमारतों जैसे लक्ष्यों के खिलाफ भी उपयोगी हो सकती है। उन्होंने कहा कि एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें जमीनी युद्ध में प्रभावी हथियार साबित होती हैं और इसी नजरिए से भारत-अमेरिका के बीच जैवलिन को लेकर हुआ समझौता महत्वपूर्ण है।
भारत के पास पहले से कई स्वदेशी विकल्प
भारत के पास पहले से ही कई स्वदेशी एंटी-टैंक हथियार प्रणालियां मौजूद हैं। प्रफुल बख्शी के अनुसार नाग मिसाइल की मारक क्षमता करीब चार किलोमीटर तक है। इसके दो संस्करण हैं और इसे चलते हुए वाहन से भी दागा जा सकता है।
इसके अलावा SANT एक हवा से दागी जाने वाली मिसाइल प्रणाली है, जो करीब 20 किलोमीटर तक के लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम बताई जाती है। उन्होंने अमोगा प्रणाली के दो संस्करणों और टैंक की गन से दागी जाने वाली सैमो मिसाइल का भी उल्लेख किया।
टैंक आगे बढ़े तो मिसाइलें बनती हैं अहम हथियार
प्रफुल बख्शी ने कहा कि युद्ध के दौरान दुश्मन के टैंक के आगे बढ़ने पर उसका मुकाबला अपने टैंकों, टैंक गन या एंटी-टैंक हथियारों से किया जा सकता है। गाइडेड मिसाइल का फायदा यह है कि इससे लंबी दूरी से बख्तरबंद लक्ष्य को निशाना बनाने का विकल्प मिलता है।
भारत की भौगोलिक स्थिति और अलग-अलग सीमाओं पर मौजूद संभावित सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए ऐसी हथियार प्रणालियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
नेपाल की बाढ़ को लेकर भी उठाए सवाल
नेपाल में हाल में आई अचानक बाढ़ और उससे हुई भारी तबाही के संदर्भ में भी प्रफुल बख्शी ने कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चीन में आए भूकंप के बाद किसी बांध के टूटने या पानी छोड़े जाने की स्थिति की पूरी जांच अभी बाकी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कहीं से पानी छोड़ा गया था तो क्या नेपाल को इसकी पहले से चेतावनी दी जा सकती थी और उस समय चेतावनी व्यवस्था किस स्थिति में थी। उनके मुताबिक इन पहलुओं की जांच जरूरी है।
30 मिनट में 30 मीटर पानी भरने पर बचाव मुश्किल
प्रफुल बख्शी ने कहा कि यदि किसी इलाके में केवल 30 मिनट के भीतर 30 मीटर पानी भर जाए तो राहत और बचाव दलों के पास कार्रवाई के लिए बेहद कम समय रह जाता है। ऐसे हालात में तत्काल पहुंचने वाली टीमें भी सीमित स्तर पर ही मदद कर पाती हैं।
उन्होंने कहा कि अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने के लिए पहले से तैयारी जरूरी है। गांवों के सरपंचों और स्थानीय प्रशासन के माध्यम से लोगों को संभावित खतरे, चेतावनी और सुरक्षित स्थानों की जानकारी पहले से दी जानी चाहिए। इससे आपदा आने पर लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।



