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FCRA बिल पर बढ़ा सियासी घमासान! सहयोगी दलों की नाराजगी से क्या अटक जाएगा परिसीमन विधेयक का रास्ता?

नई दिल्ली: संसद के मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार के सामने विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) संशोधन विधेयक को लेकर नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि सरकार इस सप्ताह FCRA संशोधन विधेयक सदन में पेश करेगी या फिर इसे फिलहाल टालने का फैसला लेगी। माना जा रहा है कि इसके पीछे प्रस्तावित परिसीमन विधेयक से जुड़े राजनीतिक समीकरण भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

FCRA संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को साधारण बहुमत की आवश्यकता होगी, जबकि परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाना जरूरी होगा। इसी कारण दोनों विधेयकों को लेकर सरकार की रणनीति पर लगातार नजर बनी हुई है।

परिसीमन पर समर्थन जुटाने में लगी सरकार

सूत्रों के मुताबिक, भाजपा अपने प्रस्तावित परिसीमन विधेयक, जिसे 131वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किए जाने की संभावना है, को पारित कराने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से बाहर के दलों से भी संपर्क साध रही है। दूसरी ओर, विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई विपक्षी और क्षेत्रीय दलों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे दल मौजूदा स्वरूप में विधेयक का विरोध करने के संकेत दे चुके हैं, जबकि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने अभी अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है।

सहयोगी दलों ने भी जताई चिंता

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और सूत्रों से हुई बातचीत में सामने आया है कि FCRA संशोधन विधेयक को लेकर मतभेद केवल विपक्ष तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भाजपा के कुछ सहयोगी दलों ने भी चिंता जताई है।

दक्षिण भारत की एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी का मानना है कि प्रस्तावित संशोधनों का असर उन संस्थानों पर पड़ सकता है, जो उसके पारंपरिक मतदाता वर्ग से जुड़े हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ सूत्र के अनुसार, सरकार के साथ बातचीत जारी है और यदि सुझावों को स्वीकार किया जाता है तो सहयोग पर विचार किया जा सकता है। अन्यथा पार्टी विधेयक का विरोध करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदान से दूरी बनाना उनके लिए विकल्प नहीं होगा।

अल्पसंख्यक समुदायों में असर की आशंका

सूत्रों के अनुसार, संबंधित क्षेत्रीय दल का बड़ा जनाधार ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में है। पार्टी को आशंका है कि मौजूदा स्वरूप में FCRA संशोधन विधेयक इन समुदायों में असंतोष पैदा कर सकता है। हालांकि परिसीमन विधेयक पर वह सरकार का समर्थन करने को तैयार हो सकती है, लेकिन इसके लिए उसकी अपनी शर्तें होंगी। वहीं FCRA संशोधन विधेयक पर समर्थन की संभावना कम बताई जा रही है।

JPC को भेजने की मांग तेज

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और डीएमके दोनों ने संकेत दिए हैं कि वे FCRA संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजने की मांग करेंगे। एनसीपी (शरद पवार गुट) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस विषय पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए और हर संस्था तथा हर दानदाता को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि सामाजिक और धर्मार्थ संस्थाओं को मिलने वाली सहायता शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण जैसे कार्यों में उपयोग होती है। कुछ संस्थाओं की कथित अनियमितताओं के आधार पर सभी संगठनों पर संदेह करना उचित नहीं होगा। पार्टी ने साफ किया कि मौजूदा स्वरूप में वह विधेयक का समर्थन नहीं करेगी। वहीं परिसीमन विधेयक पर अंतिम फैसला प्रारूप सामने आने के बाद ही लिया जाएगा।

डीएमके ने भी उठाए कई सवाल

डीएमके ने भी FCRA संशोधन विधेयक को जेपीसी के पास भेजने की मांग दोहराई है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का आरोप है कि मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक अल्पसंख्यक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों और गैर सरकारी संस्थाओं पर दबाव बढ़ा सकता है।

उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित प्रावधानों के तहत सरकार को FCRA के अंतर्गत धन प्राप्त करने वाले संस्थानों की संपत्तियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है, जिसमें पहले से खरीदी गई संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं। उनका कहना था कि यदि सुधार की आवश्यकता है तो नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए जिनसे सभी संस्थाएं संदेह के घेरे में आ जाएं।

विपक्ष ने सरकार को घेरने की बनाई रणनीति

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियां FCRA संशोधन विधेयक का विरोध करती हैं, जबकि परिसीमन विधेयक पर सरकार का साथ देती हैं, तो उनके सामने राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। बताया जा रहा है कि इन दलों में इस मुद्दे पर लगातार मंथन चल रहा है।

उधर, विपक्षी गठबंधन इंडिया ने भी संसद में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा कि उनकी पार्टी कई कारणों से इस विधेयक का विरोध करेगी।

केरल और वाम दलों ने भी जताई आपत्ति

केरल से जुड़े कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई है कि प्रस्तावित संशोधनों का असर राज्य के गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है। विपक्ष का कहना है कि पिछली तारीख से संपत्तियों पर कार्रवाई की संभावित शक्ति और अधिकारियों को व्यापक अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव गंभीर चिंता का विषय है।

एक वरिष्ठ सीपीएम नेता ने दावा किया कि प्रस्तावित संशोधनों के तहत अधिकारियों को मिलने वाली शक्तियां वक्फ संशोधन कानून में दिए गए अधिकारों से भी अधिक व्यापक हो सकती हैं।

आगे की रणनीति पर टिकी निगाहें

इससे पहले महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को विपक्षी एकजुटता के कारण संसद में चुनौती का सामना करना पड़ा था। वहीं पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में सामने आए अंदरूनी मतभेद, एनसीपी के नए राजनीतिक समीकरण और ‘ऑपरेशन टाइगर’ के बाद एनडीए की संख्या मजबूत होने के संकेत भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बने हुए हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि भाजपा अगले छह महीने के भीतर परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सहयोगी दलों और विपक्ष की आपत्तियां सरकार की रणनीति को प्रभावित कर सकती हैं।

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