मंदी से परेशान थाईलैंड में अनोखा टोटका! चेहरे पर लगवा रहे सोने की परत, ‘ना ना थोंग’ से जुड़ी है सौभाग्य और समृद्धि की मान्यता

बैंकॉक: आर्थिक सुस्ती, बढ़ती लागत और कमजोर उपभोक्ता मांग के बीच थाईलैंड में एक अनोखा धार्मिक अनुष्ठान लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में बड़ी संख्या में लोग चेहरे पर सोने का वर्क लगवाते नजर आ रहे हैं। इसके लिए लोग घंटों अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। मान्यता है कि इस रस्म के जरिए सौभाग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद हासिल किया जा सकता है।
यह अनुष्ठान थाईलैंड के अयुत्या प्रांत स्थित पोर काए न्गोएन लैन पार्क में आयोजित किया जा रहा है। यहां ‘पोर के’ नाम के एक साधु की विशाल प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय मान्यताओं में उन्हें प्राचीन ज्ञान का जानकार और भाग्य की तलाश करने वाले लोगों का रक्षक माना जाता है।
माथे से ठुड्डी तक लगाया जाता है सोने का वर्क
इस परंपरा को ‘ना ना थोंग’ कहा जाता है, जिसका अर्थ स्वर्ण मुख का आशीर्वाद बताया जाता है। अनुष्ठान के दौरान श्रद्धालुओं के माथे, गाल और ठुड्डी पर सोने की बेहद पतली परत लगाई जाती है। इसके बाद चेहरे की मालिश की जाती है, जिससे पूरा चेहरा सुनहरी चमक से भर जाता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 35 वर्षीय मास्टर टोंग इस अनुष्ठान को संपन्न कराते हैं। सोने का वर्क लगाने और मालिश के बाद विशेष मंत्रों या पूजा की प्रक्रिया भी की जाती है। इससे जुड़ी मान्यता है कि सोने की परत को त्वचा में समाहित कराकर व्यक्ति को सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का आशीर्वाद मिलता है।
थाई संस्कृति में सोने को क्यों माना जाता है शुभ?
थाई समाज में सोने का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व काफी पुराना है। इसे लंबे समय से भाग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता रहा है। मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमाओं पर सोने की परत चढ़ाने की परंपरा भी इसी धार्मिक विश्वास से जुड़ी हुई है।
इसी सोच के आधार पर ‘ना ना थोंग’ में श्रद्धालु अपने चेहरे पर सोने का वर्क लगवाते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सकता है और किस्मत बेहतर हो सकती है।
आर्थिक मुश्किलों के बीच बढ़ा अनुष्ठान का आकर्षण
थाईलैंड इस समय आर्थिक सुस्ती, बढ़ती लागत और कमजोर उपभोक्ता मांग जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। कारोबारियों और आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ने के बीच ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के प्रति लोगों का आकर्षण भी देखने को मिल रहा है।
हालांकि, इस अनुष्ठान को आर्थिक समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान नहीं माना जाता। इसके बावजूद इसमें शामिल होने वाले लोगों के लिए यह उम्मीद, आस्था और मानसिक मजबूती का प्रतीक है। लोगों का विश्वास है कि इस रस्म के जरिए आने वाला समय बेहतर हो सकता है और उनके जीवन में समृद्धि लौट सकती है।
बैंकॉक समेत कई शहरों में होती है ऐसी रस्म
‘ना ना थोंग’ जैसी परंपराएं केवल अयुत्या तक सीमित नहीं हैं। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक समेत देश के कई हिस्सों में भी इस तरह के अनुष्ठान देखने को मिलते हैं। सोशल मीडिया पर इनके वीडियो सामने आने के बाद अब यह परंपरा देश के बाहर भी लोगों का ध्यान खींच रही है।



