
वॉशिंगटन। अच्छी सेहत के लिए संतुलित नींद उतनी ही जरूरी है, जितना पौष्टिक भोजन और नियमित व्यायाम। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि रोजाना 7.5 घंटे से कम नींद लेने से याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्याप्त नींद न मिलने का सीधा असर मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, अधूरी नींद लेने वाले लोगों में भविष्य में स्मरण शक्ति कमजोर होने और अल्जाइमर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. ब्रेंडेन लूसी ने बताया कि बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और दिमागी क्षमता बनाए रखने के लिए कम से कम 7.5 घंटे की नींद बेहद अहम है।
नींद के दौरान दिमाग में क्या होता है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, सोते समय शरीर और मस्तिष्क खुद को रिपेयर करते हैं। इस दौरान कोशिकाओं का पुनर्निर्माण, मानसिक संतुलन और यादों को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया चलती है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने पर ये प्रक्रियाएं प्रभावित होती हैं, जिससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता पर असर पड़ सकता है।
बुजुर्गों पर हुई लंबी रिसर्च में सामने आए नतीजे
शोध के दौरान करीब 100 बुजुर्गों की कई वर्षों तक निगरानी की गई। उनकी नींद और मस्तिष्क गतिविधियों का अध्ययन करने पर पाया गया कि जो लोग औसतन 7.5 घंटे की नींद लेते थे, उनका कॉग्निटिव स्कोर बेहतर था। वहीं 5 से 5.5 घंटे सोने वाले लोगों में सोचने-समझने और याद रखने की क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर पाई गई।
अल्जाइमर के खतरे से भी जुड़ी है नींद
वैज्ञानिकों का मानना है कि अल्जाइमर बीमारी से जुड़े कुछ प्रोटीन मस्तिष्क में जमा होते हैं। पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद इन हानिकारक तत्वों को कम करने में मदद कर सकती है, जबकि लगातार कम नींद लेने से जोखिम बढ़ सकता है।
कम नींद के ये नुकसान भी जान लें
- याददाश्त और एकाग्रता में कमी
- तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ना
- मानसिक थकान महसूस होना
- पाचन संबंधी समस्याएं और कब्ज
- शरीर में दर्द, अकड़न और सिर भारी रहना



