
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में औद्योगिक निवेश बढ़ाने के लिए भाजपा सरकार भूमि जुटाने की नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार गुजरात, हरियाणा और आंध्र प्रदेश की तर्ज पर संशोधित लैंड पूलिंग मॉडल अपनाने की योजना बना रही है। प्रस्तावित व्यवस्था में सरकार सीधे जमीन खरीदने या अधिग्रहण करने के बजाय मध्यस्थ की भूमिका में रहेगी, जबकि निजी कंपनियां जमीन मालिकों से बाजार मूल्य पर सीधे जमीन खरीद सकेंगी।
जमीन के बदले किसानों को मिलेंगे कंपनी के शेयर
प्रस्तावित नीति के तहत निजी कंपनियां जमीन मालिकों को बाजार दर के अनुसार भुगतान करेंगी। इसके साथ ही जिस जमीन पर उद्योग स्थापित होगा, उसमें संबंधित किसानों को कंपनी के शेयर का एक निश्चित हिस्सा देने का प्रस्ताव है। अधिकारियों का मानना है कि शेयर मिलने से किसानों को एकमुश्त रकम के बजाय आगे भी नियमित आय का जरिया मिल सकता है।
हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर यह सवाल भी बना हुआ है कि शेयर बाजार और कंपनियों की जटिलताओं से अनजान ग्रामीण किसान केवल तत्काल नकद भुगतान के बजाय कंपनी में हिस्सेदारी लेने के लिए किस तरह तैयार होंगे। अधिकारियों की ओर से इस पहलू पर अभी विस्तृत योजना सामने नहीं रखी गई है।
मुख्यमंत्री ने जुलाई के रुख से बदली रणनीति
पश्चिम बंगाल सरकार की प्रस्तावित नीति को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के जुलाई में दिए गए बयान से अलग माना जा रहा है। उस समय उन्होंने कहा था कि सरकार उद्योगों के लिए सीधे जमीन खरीदेगी और बाद में उसे निजी कंपनियों को हस्तांतरित किया जाएगा।
अब सरकार ने सीधे जमीन खरीदने के बजाय संशोधित लैंड पूलिंग व्यवस्था को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। इसके पीछे बंगाल में भूमि अधिग्रहण से जुड़ी राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता को प्रमुख कारण माना जा रहा है। सरकार जल्द ही अपनी औद्योगिक नीति का मसौदा सार्वजनिक कर लोगों से सुझाव मांग सकती है।
गुजरात और आंध्र प्रदेश के मॉडल से क्या है अंतर
गुजरात और आंध्र प्रदेश में लैंड पूलिंग के तहत किसानों ने अपनी जमीन मुख्य रूप से सरकारी एजेंसियों को दी थी। विकास एजेंसियों ने इन जमीनों पर सड़क, बिजली और जल निकासी जैसी सुविधाएं विकसित कीं। इसके बाद जमीन का बड़ा हिस्सा किसानों को वापस किया गया। विकसित होने के कारण वापस मिली जमीन का मूल्य पहले की तुलना में काफी बढ़ गया, जिससे किसान उसे ऊंची कीमत पर बेच या पट्टे पर दे सकते थे।
इस मॉडल का इस्तेमाल मुख्य रूप से शहरी विकास और अवसंरचना परियोजनाओं के लिए हुआ है। आंध्र प्रदेश में अमरावती का विकास इसका प्रमुख उदाहरण रहा है।
बंगाल में किसानों की बिखरी जमीन सबसे बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित व्यवस्था गुजरात और आंध्र प्रदेश से अलग होगी। यहां निजी उद्योगों के लिए जमीन का बड़ा हिस्सा वापस करने के बजाय किसानों को बाजार मूल्य के साथ कंपनी में हिस्सेदारी देने का प्रस्ताव है।
अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जमीन के छोटे और बिखरे हुए हिस्से हैं। बंगाल में बड़ी संख्या में किसानों के पास कम क्षेत्रफल की जमीन है। अमरावती में करीब 33,000 एकड़ जमीन लगभग 25,000 किसानों से जुटाई गई थी। इसके विपरीत सिंगूर में टाटा परियोजना के लिए 997 एकड़ जमीन जुटाने के लिए करीब 14,000 जमीन मालिकों से संपर्क करना पड़ा था।
बटाईदारों की भूमिका भी बन सकती है बड़ी चुनौती
बंगाल में लंबे समय से बटाईदार व्यवस्था भी मौजूद रही है। बटाईदार दूसरे लोगों की जमीन पर खेती करते हैं और बदले में उपज का एक हिस्सा प्राप्त करते हैं। जमीन बिकने की स्थिति में उनकी आजीविका प्रभावित होने की आशंका रहती है, इसलिए अतीत में जमीन बिक्री के प्रयासों का बटाईदारों की ओर से विरोध भी हुआ है।
सिंगूर में भूमि अधिग्रहण के विरोध के दौरान भी बटाईदारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। बताया गया था कि कई वास्तविक जमीन मालिक सरकार से मुआवजा लेने के लिए तैयार थे, लेकिन बटाईदारों की चिंताएं अलग थीं। अधिकारियों का कहना है कि इन आशंकाओं को दूर करने के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी, हालांकि उसका विस्तृत खाका अभी सामने नहीं आया है।
सिंगूर-नंदीग्राम के बाद भूमि अधिग्रहण बना संवेदनशील मुद्दा
पश्चिम बंगाल में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण लंबे समय से संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलनों के बाद सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार ने उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण से दूरी बना ली थी।
शुभेंदु अधिकारी ने पहले 2013 के डायरेक्ट लैंड परचेज नियम का हवाला देते हुए जमीन खरीदने की बात कही थी। लेकिन बंगाल में जमीन के छोटे और बिखरे हुए हिस्सों के कारण निजी कंपनियों के लिए बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए पर्याप्त जमीन सीधे खरीदना व्यावहारिक रूप से कठिन साबित हो रहा है।



