
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी अंतर्कलह अब विधानसभा की अहम समितियों तक पहुंच गई है। लोक लेखा समिति (PAC) के अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर पार्टी के दो गुटों के बीच टकराव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। राजनीतिक हलकों में इस चुनाव को केवल एक संसदीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि टीएमसी के भीतर वास्तविक ताकत और समर्थन की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
विधानसभा सचिवालय ने मंगलवार को लोक लेखा समिति, सार्वजनिक उपक्रम समिति, आकलन समिति और स्थानीय निधि लेखा समिति के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी। जारी अधिसूचना के अनुसार 30 जून तक नामांकन दाखिल किए जाएंगे, 1 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 2 जुलाई तक नाम वापस लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। यदि आवश्यक हुआ तो 5 जुलाई को मतदान कराया जाएगा।
टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई का नया मोर्चा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला खेमा है, वहीं दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की तैयारी में जुटा है।
इसी कारण PAC अध्यक्ष पद का चुनाव दोनों गुटों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। माना जा रहा है कि चुनावी नतीजे विधानसभा के भीतर दोनों पक्षों के वास्तविक समर्थन का संकेत दे सकते हैं।
केवल विपक्षी विधायक करेंगे भागीदारी
विधानसभा सूत्रों के अनुसार इन समितियों के चुनाव में विपक्षी दलों के विधायक हिस्सा लेंगे। इनमें तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, सीपीआई(एम) और आईएसएफ के सदस्य शामिल हैं।
संसदीय परंपरा के तहत लोक लेखा समिति का अध्यक्ष आमतौर पर विपक्षी दल से चुना जाता है, ताकि सरकारी खर्च और वित्तीय मामलों की निष्पक्ष समीक्षा सुनिश्चित की जा सके। हालांकि यह कोई कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही संसदीय परंपरा है।
ऋतब्रत गुट भी ठोक सकता है दावा
सूत्रों के मुताबिक टीएमसी के भीतर जारी खींचतान के कारण इस बार PAC अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला होने की संभावना काफी बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि ऋतब्रत बनर्जी गुट इस पद पर अपना दावा पेश करने की तैयारी में है और वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम के नाम पर भी विचार किया जा रहा है।
बागी गुट का दावा है कि उसे पार्टी के 80 में से 65 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मतदान हुआ तो होगा असली शक्ति परीक्षण
जानकारों का कहना है कि दोनों गुट समिति सदस्यता के लिए अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतार सकते हैं। यदि उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से अधिक हुई तो मतदान की नौबत आ सकती है।
ऐसी स्थिति में विधानसभा के भीतर यह चुनाव दोनों खेमों के बीच प्रत्यक्ष शक्ति परीक्षण में बदल जाएगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मतदान की स्थिति बनने पर परिणाम राज्य की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।
टीएमसी में नेतृत्व विवाद ने बढ़ाई सियासी हलचल
पार्टी के भीतर विवाद उस समय और गहरा गया जब हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने दावा किया कि ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। इसके साथ ही वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष घोषित करने और समानांतर संगठनात्मक ढांचे के गठन की घोषणा भी की गई।
दूसरी ओर ममता बनर्जी समर्थक गुट का कहना है कि संशोधित राष्ट्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारियों की सूची पहले ही चुनाव आयोग को सौंप दी गई थी और वही वैध संगठनात्मक संरचना है।
‘असली टीएमसी’ को लेकर जारी है विवाद
पार्टी के भीतर कौन सा गुट वास्तविक टीएमसी का प्रतिनिधित्व करता है, इसे लेकर राजनीतिक और कानूनी स्तर पर विवाद जारी है। ऐसे में विधानसभा समितियों का चुनाव अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि पार्टी पर नियंत्रण की लड़ाई का महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
PAC को लेकर पहले भी हो चुका है विवाद
पश्चिम बंगाल में लोक लेखा समिति को लेकर पहले भी राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान भाजपा ने आरोप लगाया था कि PAC में ऐसे विधायकों को शामिल किया गया जो तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके थे, लेकिन उन्होंने अपने पूर्व पदों से इस्तीफा नहीं दिया था।
उस समय विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा ने समिति की कई बैठकों का बहिष्कार भी किया था।
5 जुलाई पर टिकीं राजनीतिक नजरें
अब सभी की निगाहें 5 जुलाई पर टिकी हुई हैं। यदि मतदान की स्थिति बनती है तो यह स्पष्ट हो सकता है कि विधानसभा के भीतर तृणमूल कांग्रेस के किस गुट को अधिक समर्थन हासिल है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव राज्य की सियासत में आगे होने वाले घटनाक्रमों की दिशा भी तय कर सकता है।



