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ईरान युद्ध, ट्रंप और कश्मीर: आसिम मुनीर की कूटनीति पर उठे सवाल, दक्षिण एशिया की राजनीति पर बढ़ी नजरें

नई दिल्ली। पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की हालिया कूटनीतिक गतिविधियां दक्षिण एशियाई राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में जारी घटनाक्रमों और ईरान से जुड़े तनाव के बीच उनकी भूमिका को लेकर विभिन्न स्तरों पर अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सक्रियता केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि इसके पीछे पाकिस्तान के दीर्घकालिक रणनीतिक हित भी जुड़े हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर मुद्दे को वैश्विक मंचों पर प्रमुखता से उठाने का प्रयास करता रहा है। ऐसे में यदि पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है, तो इस्लामाबाद अपनी कूटनीतिक ऊर्जा दोबारा दक्षिण एशिया से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित कर सकता है। यही वजह है कि आसिम मुनीर की विदेश नीति से जुड़ी गतिविधियों पर अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की भी नजर बनी हुई है।

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर लंबे समय से विवाद का प्रमुख विषय रहा है। दोनों देशों के बीच 1947-48, 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध सहित कई सैन्य संघर्ष हो चुके हैं। इसके अलावा सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा संबंधी घटनाओं ने भी दोनों देशों के रिश्तों को लगातार प्रभावित किया है।

भारत लगातार पाकिस्तान पर सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है, जबकि पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज करता है। भारतीय सुरक्षा तंत्र का मानना है कि उरी और पुलवामा जैसे हमलों के बाद देश की आतंकवाद-रोधी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आया और सुरक्षा मामलों में अधिक सख्त रुख अपनाया गया।

विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान इस समय आर्थिक दबाव, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक सत्ता संघर्ष जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में सेना नेतृत्व की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय रणनीति, दोनों दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि आसिम मुनीर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या किसी अन्य वैश्विक शक्ति के बीच कथित गुप्त समझौतों अथवा रणनीतिक साजिशों से जुड़े कई दावे सार्वजनिक बहस का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश दावों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए ऐसे दावों को स्थापित तथ्य के बजाय राजनीतिक विश्लेषण और राय के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

फिलहाल पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया दोनों ही क्षेत्र वैश्विक कूटनीतिक गतिविधियों के केंद्र में हैं। आने वाले समय में क्षेत्रीय सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और प्रमुख शक्तियों की नीतियां यह तय करेंगी कि मौजूदा तनाव कम होगा या नए भू-राजनीतिक समीकरण उभरकर सामने आएंगे।

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