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जम्मू-कश्मीर में 21.81 लाख किताबों की स्क्रीनिंग, 4767 हटाईं; उमर अब्दुल्ला और मीरवाइज ने उठाए सवाल

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के कॉलेजों और पुस्तकालयों में किताबों की जांच और उन्हें हटाए जाने को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। उच्च शिक्षा विभाग के अनुसार, 21,81,582 किताबों और प्रकाशनों की स्क्रीनिंग की गई, जिसके बाद 4,767 किताबों को प्रचलन से हटाया गया। इनमें 518 ऐसी किताबें हैं, जो पहले से प्रतिबंधित 19 शीर्षकों की प्रतियां हैं। 1,752 किताबों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेजा गया है और इन पर फैसला होना बाकी है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने किताबों पर प्रतिबंध और उन्हें हटाने के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में निर्वाचित सरकार यह तय नहीं करती कि किन किताबों को प्रतिबंधित या हटाया जाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में किताबों पर प्रतिबंध का मुद्दा व्यापक बहस की मांग करता है और प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव होने पर इस मामले की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

मीरवाइज ने मांगी हटाई गई किताबों की पूरी जानकारी

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए हटाई गई किताबों के शीर्षक और उन्हें हटाने के कारण सार्वजनिक करने की मांग की। उन्होंने अकादमिक स्वतंत्रता और विद्यार्थियों को अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों तक पहुंच मिलने को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनका कहना है कि छात्रों को क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं, यह तय करने से उनकी सीखने की क्षमता और तार्किक सोच प्रभावित हो सकती है।

विधानसभा में सरकार के जवाब के अनुसार, 4,767 हटाई गई किताबों में 4,474 कश्मीर क्षेत्र और 293 जम्मू क्षेत्र से हैं। वहीं, विशेषज्ञ जांच के लिए भेजी गई 1,752 किताबों में 1,214 कश्मीर और 538 जम्मू क्षेत्र की हैं।

सरकार ने बताया- किताबों की जांच नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया

मुख्य सचिव अटल डुल्लू ने इस कार्रवाई को नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बताया। उनके अनुसार, किताबों की जांच करना और उनमें मौजूद सामग्री की पड़ताल करना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। यदि कोई किताब आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित है या उसमें आपत्तिजनक सामग्री है तो उसे सरकारी संस्थानों या परिसरों की लाइब्रेरी में नहीं रखा जाना चाहिए।

सरकार ने विधानसभा में कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में संवैधानिक मूल्यों, अकादमिक स्वतंत्रता, आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिम्मेदार नागरिकता और देश की संप्रभुता, एकता तथा अखंडता के सम्मान वाला वातावरण सुनिश्चित करना जरूरी है।

भाजपा नेताओं ने फैसले का समर्थन किया

भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों में इतिहास तथ्यों के आधार पर पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि काल्पनिक किस्सों, अफवाहों और किंवदंतियों के आधार पर लिखी गई किताबों को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता जोरवार सिंह जमवाल ने भी प्रतिबंधित पुस्तकों की सामग्री पर सवाल उठाया। उनके अनुसार, ऐतिहासिक विषयों से जुड़ी पुस्तकों में तथ्यपरक और विश्वसनीय सामग्री होनी चाहिए तथा शिक्षण संस्थानों में प्रमाणित इतिहास से जुड़ी किताबों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जुलाई में दो किताबों के विवाद के बाद शुरू हुई व्यापक स्क्रीनिंग

सरकार के अनुसार, जुलाई में दो किताबों की खरीद को लेकर विवाद सामने आया था। इनमें अत्यधिक आपत्तिजनक सामग्री होने की बात कही गई थी। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेजों और अन्य शिक्षण संस्थानों की लाइब्रेरी में मौजूद किताबों की व्यापक स्क्रीनिंग के निर्देश दिए।

विधानसभा में यह जानकारी लंगेट से अवामी इत्तेहाद पार्टी के विधायक खुर्शीद अहमद शेख के सवाल के जवाब में सामने आई। सरकार ने बताया कि अब तक 21,81,582 किताबों और प्रकाशनों की जांच की जा चुकी है और समीक्षा की प्रक्रिया अभी जारी है।

किताबों की स्क्रीनिंग के आंकड़े

कश्मीर क्षेत्र में 12,48,641 और जम्मू क्षेत्र में 9,32,941 किताबों तथा प्रकाशनों की जांच की गई। 4,249 ऐसी किताबें प्रचलन से हटाई गईं जो इस कार्रवाई से पहले प्रतिबंधित सूची में शामिल नहीं थीं। इसके अलावा 518 प्रतियां पहले से प्रतिबंधित 19 शीर्षकों की थीं। 1,752 किताबों को विशेषज्ञ जांच के लिए भेजा गया है।

इस कार्रवाई के बाद जम्मू-कश्मीर में किताबों की स्क्रीनिंग और उन्हें हटाने के मानदंड को लेकर राजनीतिक मतभेद सामने आए हैं। एक ओर प्रशासन इसे सामग्री की जांच और संस्थानों में निर्धारित शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने की प्रक्रिया बता रहा है, जबकि दूसरी ओर इस कदम को लेकर किताबों की सूची, हटाने के कारण और अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं।

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