दिल्लीराज्य

बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में दो दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, 17 साल जेल में रहने के बाद मिली राहत

नई दिल्ली: 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो दोषियों को जमानत दे दी है। अदालत ने दोनों को राहत देते हुए उनके 17 साल से अधिक समय तक जेल में रहने का हवाला दिया। हालांकि, जमानत के दौरान उन्हें ट्रायल कोर्ट की ओर से निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर को बिपिनचंद कन्हैयालाल जोशी और प्रदीप रमनलाल मोधिया को जमानत देने का आदेश दिया। इससे पहले इसी मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई का फैसला सुप्रीम कोर्ट रद्द कर चुका है। इन सभी को वर्ष 2008 में दोषी ठहराया गया था।

दोषियों पर आरोप था कि गुजरात दंगों के दौरान उन्होंने तीन महीने की गर्भवती बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था और उनकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के सात सदस्यों की हत्या कर दी थी। अगस्त 2022 में गुजरात सरकार ने इन 11 दोषियों को सजा में छूट देकर रिहा करने का आदेश दिया था। इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई थी।

गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों से मांगा गया था जवाब

साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की समय से पहले रिहाई के आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि गुजरात सरकार के पास सजा में छूट देने का अधिकार नहीं था, क्योंकि मामले की सुनवाई मुंबई स्थानांतरित कर दी गई थी। इस वजह से सजा में छूट के मामले में महाराष्ट्र सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

अदालत ने यह भी कहा था कि वर्ष 2022 में गुजरात सरकार को सजा में छूट पर विचार करने की अनुमति देने वाला आदेश धोखाधड़ी और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर हासिल किया गया था।

जोशी और मोधिया ने मार्च में बॉम्बे हाई कोर्ट के 2017 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों से जवाब मांगा था।

17 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं दोनों दोषी

28 अक्टूबर के आदेश में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि दोनों अपीलकर्ता 17 साल से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों में से एक दोषी जोशी गंभीर रूप से विकलांग है।

पीठ के मुताबिक, इस अपील में तथ्य और कानून से जुड़े ऐसे सवाल हैं, जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। अदालत ने इस बात का भी उल्लेख किया कि अपीलकर्ताओं में से एक का नाम प्राथमिकी में शामिल नहीं था और उसे करीब तीन साल के लंबे अंतराल के बाद मामले में आरोपी बनाया गया था।

ट्रायल कोर्ट की शर्तों का करना होगा पालन

गुरुवार देर रात अपलोड किए गए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों दोषियों को जमानत दी जा रही है, लेकिन उन्हें ट्रायल कोर्ट की ओर से तय शर्तों का पालन करना होगा।

दोनों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और सोनिया माथुर ने अदालत को बताया कि उन्हें नौ अन्य लोगों के साथ हत्या और सामूहिक दुष्कर्म से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था। अदालत ने उन्हें आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाने के साथ जुर्माना भी लगाया था।

वहीं, जमानत का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे ने अपराध की गंभीरता का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि निचली अदालतों ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखकर फैसला सुनाया था, जो जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण है।

2003 में सीबीआई को सौंपी गई थी जांच

फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन जलाए जाने के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। इसी दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई थी। उस समय वह 21 साल की थीं और तीन महीने की गर्भवती थीं।

दिसंबर 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने का आदेश दिया था। इसके बाद अगस्त 2004 में अदालत ने मुकदमे की सुनवाई गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दी थी।

अगस्त 2022 में गुजरात सरकार ने 11 दोषियों को सजा में छूट देकर रिहा कर दिया था। इसके कुछ समय बाद बिलकिस बानो ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जनवरी 2024 में शीर्ष अदालत ने दोषियों की रिहाई का आदेश रद्द कर दिया था। इसके बाद से सभी दोषी गुजरात की जेल में बंद थे।

Related Articles

Back to top button