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इस्लाम में 7–7–7 पैरेंटिंग फ्रेमवर्क और राष्ट्र निर्माण में इसकी भूमिका

इस्लामी शिक्षाएं एक संतुलित और व्यापक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

Bulandsahar News: इस्लाम में बच्चों की परवरिश को एक बहुत बड़ी अमानत और जिम्मेदारी माना गया है। माता-पिता न सिर्फ अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि उनकी धार्मिक, नैतिक और सामाजिक परवरिश के भी जिम्मेदार होते हैं। आज के दौर में जहां पारिवारिक व्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है, वहीं इस्लामी शिक्षाएं एक संतुलित और व्यापक मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। इन्हीं मार्गदर्शक सिद्धांतों में एक महत्वपूर्ण अवधारणा “7–7–7 फ्रेमवर्क” की है, जो बच्चों की परवरिश के तीन अहम चरणों को बयान करती है। यह फ्रेमवर्क न सिर्फ एक अच्छे इंसान के निर्माण में मदद करता है, बल्कि एक मजबूत राष्ट्र और जिम्मेदार समाज की नींव भी रखता है। ये बातें बुलंदशहर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जमीयत इस्लामी हिंद के अध्यक्ष मौहम्मद आसिम ने कही। मरकज मस्जिद में आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
हर हिस्सा सात साल का
मोहम्मद आसिम ने कहा कि 7–7–7 फ्रेमवर्क के अनुसार बच्चे की जिंदगी को तीन हिस्सों में बांटा जाता है, हर हिस्सा सात साल का होता है। पहले सात साल प्यार और ममता का समय होता है, दूसरे सात साल अनुशासन और शिक्षा का, जबकि तीसरे सात साल सलाह, मार्गदर्शन और विश्वास का दौर होता है। यह विभाजन मानव मनोविज्ञान और प्राकृतिक विकास के बिल्कुल अनुकूल है।
उन्होंने कहा कि पहले सात साल बच्चे की जिंदगी के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौर में बच्चे को भरपूर प्यार, ध्यान और सुरक्षा की जरूरत होती है। इस्लाम हमें सिखाता है कि बच्चों के साथ नरमी, ममता और प्यार का व्यवहार किया जाए। पैगंबर मुहम्मद ﷺ बच्चों से बहुत प्यार करते थे, उन्हें गोद में उठाते, दुलारते और उनके साथ खेलते थे। इस चरण में बच्चे के अंदर आत्मविश्वास, प्रेम और भावनात्मक स्थिरता विकसित होती है। अगर इस समय बच्चे को प्यार और ध्यान न मिले तो वह असुरक्षा और मानसिक तनाव का शिकार हो सकता है, जो उसके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
दूसरे सात सालों में बच्चे की परवरिश का तरीका बदलता है
दूसरे सात सालों में बच्चे की परवरिश का तरीका बदल जाता है। अब इसमें अनुशासन, जिम्मेदारी और नैतिक शिक्षा को शामिल किया जाता है। इस्लाम में सात साल की उम्र से नमाज़ की शिक्षा देने की हिदायत दी गई है, जो इस बात का संकेत है कि इस उम्र में बच्चे को अनुशासन सिखाना जरूरी है। इस चरण में माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को सही और गलत की पहचान कराएं, ईमानदारी, सच्चाई, सब्र और सहनशीलता जैसी खूबियां उनमें विकसित करें। यही वह समय है जब बच्चे में सामाजिक मूल्यों, राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रवाद और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना पैदा की जा सकती है।
तीसरे सात सालों में बच्चे को एक दोस्त की तरह समझा जाता
तीसरे सात सालों में बच्चे को एक दोस्त की तरह समझा जाता है। इस चरण में उसे आजादी दी जाती है, उसकी राय को महत्व दिया जाता है और उसे जीवन के फैसलों में शामिल किया जाता है। यह युवावस्था का समय होता है, जहां व्यक्तित्व पूरी तरह विकसित हो रहा होता है। अगर माता-पिता इस दौर में ज्यादा सख्ती करें तो बच्चा बगावत या दूरी अपना सकता है, लेकिन अगर उसे विश्वास दिया जाए तो वह एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बन सकता है।
राष्ट्र निर्माण में इस फ्रेमवर्क का बहुत महत्वपूर्ण योगदान
इस्लामिक विचारक शहाबुद्दीन ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में इस फ्रेमवर्क का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। अगर हर घर में बच्चों की परवरिश इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार की जाए तो पूरा समाज खुद-ब-खुद सुधर सकता है। ऐसे लोग जो बचपन से ही सच्चाई, न्याय, जिम्मेदारी और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना सीखते हैं, वे भ्रष्टाचार, अन्याय और सामाजिक बुराइयों से दूर रहते हैं। इस तरह एक साफ-सुथरा और मजबूत समाज बनता है।
उन्होंने कहा कि देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता भी इसी परवरिश का हिस्सा हैं। जब बच्चों को शुरू से ही अपने देश से प्रेम, उसके कानूनों का सम्मान और उसकी तरक्की में योगदान देने की शिक्षा दी जाती है, तो वे एक सच्चे देशभक्त नागरिक बनते हैं। इस्लाम हमें अपने देश के प्रति वफादारी, शांति बनाए रखने और न्याय को बढ़ावा देने की शिक्षा देता है। अगर नई पीढ़ी इन सिद्धांतों को अपनाए, तो देश विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ सकता है। अंत में, यह कहना सही होगा कि अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को मजबूत, नैतिक और देशभक्त बनाना चाहते हैं, तो हमें इन सिद्धांतों पर आधारित इस परवरिश के मॉडल को अपनाना होगा। क्योंकि एक अच्छा इंसान ही एक अच्छा समाज बनाता है, और एक अच्छा समाज ही एक मजबूत और सफल राष्ट्र की नींव होता है।

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