याद वाशेम पहुंचे PM मोदी, शहीदों को किया नमन, होलोकास्ट में नाजियों ने मार दिए थे 60 लाख यहूदी!

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री (PM) नरेंद्र मोदी इजरायल (Israel) में ‘याद वाशेम’ पहुंचे हुए हैं. उनके साथ इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामीन नेतन्याहू भी मौजूद थे. पीएम मोदी होलोकास्ट पीड़ितों की निशानियों से रूबरू हुए और उन्हें नमन किया. ये जगह होलोकास्ट की याद दिलाती है. यहां होलोकास्ट के दौरान जान गंवाने वाले लाखों लोगों की व्यक्तिगत चीजें उनकी याद की तौर पर संग्रहित हैं.
दरअसल, जर्मनी में नाजी शासनकाल में तानाशाह एडॉल्फ हिटलर ने ‘फाइनल सॉल्यूशन’ के नाम से यहूदियों के खिलाफ एक कुख्यात अभियान चलाया था, उसे होलोकास्ट के नाम से जाना जाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी कब्जे वाले इलाके में यहूदियों के नरसंहार के लिए बड़े-बड़े कैंप बनाए गए थे, जहां जहरीले गैस से लाखों यहूदियों को मौत दी गई.
होलोकॉस्ट 1933 और 1945 के बीच जर्मन नाजी शासन द्वारा लाखों यूरोपीय यहूदियों, रोमानी लोगों, मानसिक रूप से अक्षम लोगों, राजनीतिक असंतुष्टों और नाजी विरोधियों का सामूहिक नरसंहार था. होलोकास्ट में लगभग छह मिलियन यानी 60 लाख यहूदी और लगभग पांच मिलियन अन्य लोग मारे गए थे. मरने वालों में दस लाख से अधिक बच्चे थे.
होलोकास्ट दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है -‘होलोस’ और ‘काउस्टोस’. ‘होलोस’ का मतलब होता है संपूर्ण और ‘काउस्टोस’ का अर्थ जला हुआ होता है. ऐतिहासिक रूप से इसे वेदी पर जलाई गई बलि के रूप में यहूदियों ने इस्तेमाल किया. क्योंकि, नाजी शासन ने सामूहिक तौर पर यहूदियों को जलाकर और गैस चेंबर में डालकर मार डाला था.
सितंबर 1939 में, जर्मनी ने पोलैंड के पश्चिमी हिस्से पर आक्रमण किया. इससे द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई. जर्मन पुलिस ने जल्द ही हजारों पोलिश यहूदियों को उनके घरों से जबरन निकालकर यहूदी बस्तियों में भेज दिया. ऊंची दीवारों और कांटेदार तारों से घिरे पोलैंड के यहूदी बस्ती में भुखमरी और महामारी ने पैर पसार रखा था.
1939 की सर्दी में नाजी अधिकारियों ने इच्छामृत्यु कार्यक्रम शुरू किया. इसके तहत जर्मनी में बंदी बनाकर रखे गए यहूदियों में से 70 हजार मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार लोगों को चिह्नित कर पोलैंड लाया गया और सभी को सामूहिक रूप से एक चैंबर में बंदकर उन पर जहरीला गैस डाल दिया गया. यह होलोकास्ट का शुरुआती चरण था.
फिर 1940 में जर्मन सेना ने यूरोप में हिटलर के साम्राज्य का विस्तार किया और डेनमार्क, नॉर्वे, नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्ज़मबर्ग और फ्रांस पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद 1941 से शुरू होकर, पूरे महाद्वीप से यहूदियों के साथ-साथ लाखों यूरोपीय रोमा लोगों को नाजी कब्जे वाले पोलैंड में स्थित यहूदी बस्तियों में भेजा जाने लगा.
यहां पोलैंड के क्राकोव के पास स्थित ऑशविट्ज़ यातना शिविर में सामूहिक हत्या के तरीकों पर पहले से प्रयोग चल रहे थे. इस शिविर में लोगों को सामूहिक तौर पर जहरीला गैस देकर मारा जाने लगा. यहां यहूदियों का तरह-तरह से नरसंहार हुआ. कई बार इन कंस्ट्रेशन कैंप में यहूदियों को बंद कर आग भी लगा दी जाती या भट्ठियों में झोंक दिया जाता था.
1941 के अंत में जर्मनों ने कब्जे वाले पोलैंड में यहूदी बस्तियों से कंस्ट्रेंशन शिविरों में बड़े पैमाने पर लोगों को भेजना शुरू किया. इसकी शुरुआत उन लोगों से की गई जिन्हें सबसे कम उपयोगी माना जाता था. इनमें बीमार, बूढ़े और कमजोर लोगों के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे. लुब्लिन के पास स्थित बेल्ज़ेक नरसंहार शिविर में 17 मार्च, 1942 को पहली बार सामूहिक गैस चैंबर में लोगों को मारने का सिलसिला शुरू हुआ. कब्जे वाले पोलैंड में पांच और नरसंहार शिविर बनाए गए,. इनमें चेल्मनो, सोबिबोर, ट्रेब्लिंका, माजदानेक और सबसे बड़ा ऑशविट्ज शामिल थे.
1942 से 1945 तक, जर्मनी के नियंत्रण वाले क्षेत्रों के साथ-साथ जर्मनी के सहयोगी देशों सहित पूरे यूरोप से यहूदियों को नरसंहार और यातना शिविरों में भेज दिया गया. सबसे भीषण निर्वासन 1942 की गर्मियों और शरद ऋतु के दौरान हुआ, जब अकेले वारसॉ यहूदी बस्ती से 3 लाख से अधिक लोगों को निर्वासित किया गया. सभी लोगों को नरसंहार कैंप में ले जाकर उनकी हत्या कर दी गई.
अकेले ऑशविट्ज़ में ही लगभग 11 लाख लोगों की हत्या कर दी गई, जो एक बड़े पैमाने पर औद्योगिक नरसंहार जैसा था. वहां के श्रम शिविर में यहूदी और गैर-यहूदी कैदियों की एक बड़ी आबादी काम करती थी. गैस चैंबर में मारे गए लोगों में यहूदियों की संख्या बहुत अधिक थी.
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद होलोकॉस्ट के यहूदी पीड़ितों के लिए एक देश बनाने का मित्र देशों पर दबाव बढ़ने लगा था. इस वजह से 1947 की संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला, जिसने 1948 में इज़राइल के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया.
अलग इजरायल बनने के बाद 1950 के दशक में यरूशलम में एक विशाल वर्ल्ड होलोकास्ट रिमेंबरेंस सेंटर बनाया गया. इसमें जीवित बचे लोगों के प्रत्यक्ष वृत्तांतों और पीड़ितों की निशानियों का संग्रह किया जाने लगा. होलोकास्ट की याद में बने इस संग्राहलय को ही ‘याद वाशेम’ नाम दिया गया.
याद वाशेम में निजी क्षेत्र के दस्तावेज संग्रह के प्रमुख ओरिट नोइमान ने जेरुशल पोस्ट को बताया कि यहां की हर वस्तु एक प्रकार की होलोकास्ट की मूक गवाही है. इनके माध्यम से हम पीड़ितों की एक व्यक्तिगत कहानी बता सकते हैं. इतने वर्षों से याद वाशेम होलोकास्ट पीड़ितों के व्यक्तिगत कहानियों का दस्तावेजीकरण कर रहा है, फिर भी बहुत सारी जानकारी अभी भी अनुपलब्ध है.
नोइमान ने कहा कि याद वाशेम हमेशा से इस तरह की वस्तुओं का संग्रह करता रहा है, लेकिन 2011 में इसने पारिवारिक विरासत की वस्तुओं को साझा करने के लिए जनता से अपनी अपील तेज कर दी. अपनी संग्रह प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित रूप से पुनर्गठित किया. इसमें न केवल वस्तु पर बल्कि उसके पीछे की कहानी पर भी ध्यान केंद्रित किया गया.
आज गैदरिंग द फ्रैगमेंट्स परियोजना के तहत, केंद्र के पास विभिन्न स्रोतों से 200 मिलियन से अधिक होलोकास्ट की यादों से जुड़े पन्ने हैं, जैसे कि नाजी मैटेरियल और प्रत्यक्षदर्शियों का विवरण और 31,500 से अधिक कलाकृतियां भी हैं. याद वशेम इन अवशेषों के जरिए होलोकास्ट की उन यादों को समेटे है, जो यहूदी अस्तित्व के सबसे बड़े संघर्ष की याद दिलाता है.



