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आटा गूंथने के बाद उंगलियों के निशान क्यों बनाए जाते हैं? जानिए धार्मिक मान्यता, वास्तु नियम और इसकी खास वजह

नई दिल्ली: भारतीय रसोई में कई ऐसी परंपराएं आज भी निभाई जाती हैं, जिनके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ व्यवहारिक कारण भी जुड़े होते हैं। इन्हीं में से एक परंपरा है आटा गूंथने के बाद उस पर उंगलियों के निशान बनाना। कई लोग इसे सिर्फ पुरानी आदत मानते हैं, लेकिन सनातन परंपरा और वास्तु शास्त्र में इसे विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि गूंथे हुए आटे पर उंगलियों के निशान बनाने से न केवल धार्मिक नियमों का पालन होता है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी बना रहता है।

पितरों से जुड़ी मान्यता

वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि गूंथे हुए आटे को पूरी तरह गोल, चिकना और बिना किसी निशान के छोड़ दिया जाए तो उसका स्वरूप पिंड जैसा माना जाता है। हिंदू धर्म में पिंड का उपयोग श्राद्ध और तर्पण के दौरान पितरों को अर्पित करने के लिए किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि आटे पर उंगलियों के निशान बनाकर उसकी गोलाई को तोड़ दिया जाता है, जिससे वह सामान्य भोजन के रूप में शुद्ध और उपयोग योग्य माना जाता है।

नकारात्मक ऊर्जा से बचाने की मान्यता

वास्तु मान्यताओं के मुताबिक रसोई घर पूरे परिवार की सकारात्मक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र होता है। कहा जाता है कि बिना निशान वाला गोल आटा नकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित कर सकता है। इससे परिवार में तनाव, विवाद और मानसिक अशांति बढ़ने की आशंका मानी जाती है। उंगलियों के निशान बनाने से आटे की ऊर्जा सकारात्मक बनी रहती है और उसे परिवार के पोषण का प्रतीक माना जाता है।

मां अन्नपूर्णा के प्रति सम्मान का प्रतीक

हिंदू परंपरा में अन्न को ब्रह्म और रसोई को मां अन्नपूर्णा का निवास माना गया है। मान्यता है कि आटे की गोलाई को उंगलियों के निशान से तोड़ना मां अन्नपूर्णा के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है। ऐसी परंपराओं का पालन करने से घर में सुख, समृद्धि और बरकत बनी रहने की मान्यता है।

इस परंपरा के पीछे व्यवहारिक कारण भी हैं

धार्मिक और वास्तु मान्यताओं के अलावा इसका एक व्यावहारिक पक्ष भी माना जाता है। पुराने समय में संयुक्त परिवारों में रसोई में कई लोग एक साथ काम करते थे। ऐसे में गूंथे हुए आटे पर बने उंगलियों के निशान यह संकेत देते थे कि आटा पूरी तरह तैयार हो चुका है और अब उससे रोटियां बनाई जा सकती हैं। इससे रसोई में काम करने वाले अन्य लोगों को सुविधा रहती थी और किसी तरह का भ्रम नहीं होता था।

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