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UCC से Youth Connect तक: भाजपा का धामी मॉडल

राम कुमार सिंह

पुष्कर सिंह धामी का राजनीतिक मूल्यांकन समय करेगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होंने उत्तराखंड में शासन को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहने दिया। UCC जैसे निर्णय, नकल विरोधी कानून जैसी पहल और युवाओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद की शैली ने उन्हें समकालीन भाजपा के उन नेताओं में शामिल कर दिया है जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

स्तंभ: “राजनीति केवल सरकार चलाने का नाम नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के मन में भविष्य का विश्वास स्थापित करने की कला भी है।”

भारतीय राजनीति एक निर्णायक संक्रमण काल से गुजर रही है। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास, राष्ट्रवाद और सुशासन के आधार पर भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक और राजनीतिक विस्तार किया। लेकिन अब एक नया प्रश्न सामने है।उस पीढ़ी तक यह विचार कैसे पहुंचे, जिसने 2014 से पहले का भारत देखा ही नहीं?

यह वही पीढ़ी है जिसे आज Gen Z कहा जाता है। उसकी राजनीतिक समझ टीवी बहसों से कम और मोबाइल स्क्रीन से अधिक बनती है। वह सूचना के महासागर में रहती है, लेकिन संदर्भों से अक्सर दूर होती है। ऐसे समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि नैरेटिव का उत्तराधिकार (Narrative Succession)सुनिश्चित करना भी है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आज का हरिद्वार में “युवा शक्ति संवाद” से भविष्य की झलक साफ देखी जा सकती है।

यह कार्यक्रम केवल युवाओं से मुलाकात का नहीं था। यह उस राजनीति का संकेत है जिसमें नेतृत्व मंच से भाषण देने के बजाय युवाओं के बीच बैठकर संवाद करता है। सवाल सुनता है, उत्तर देता है और अपनी सरकार के निर्णयों को सीधे समझाता है।

राजनीति का नया मैदान: सोशल मीडिया नहीं, सीधा संवाद

आज हर राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर मौजूद है। लेकिन उनके एल्गोरिद्म भरोसा नहीं बनाते। भरोसा तब बनता है जब युवा महसूस करे कि नेतृत्व उसे सुन रहा है।

धामी का संवाद मॉडल इसी कारण उल्लेखनीय है। वे केवल सरकार की उपलब्धियाँ नहीं गिनाते, बल्कि यह समझाने का प्रयास करते हैं कि सरकार ने जो निर्णय लिए वो क्यों लिए। यही आधुनिक राजनीति की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

UCC: केवल कानून नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति का संदेश

पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। दशकों तक जिस विषय पर केवल बहस होती रही, उसे उत्तराखंड ने प्रशासनिक और विधायी रूप दिया।

उत्तराखंड की जनता के लिए यह केवल एक कानूनी सुधार नहीं था, बल्कि संविधान में निहित समानता की अवधारणा की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था और राजनीतिक दृष्टि से यह संदेश भी गया कि यदि इच्छाशक्ति हो तो कठिन माने जाने वाले विषयों पर भी निर्णय लिए जा सकते हैं।

नकल विरोधी कानून: युवाओं के विश्वास की रक्षा

यदि किसी राज्य में सबसे अधिक निराशा प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी हो, तो सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश परीक्षा प्रणाली को निष्पक्ष बनाना होता है। उत्तराखंड में धामी सरकार ने नकल रोकने के लिए कठोर कानून लागू किया और परीक्षा अनियमितताओं पर कार्रवाई की। यह कदम केवल अपराधियों के विरुद्ध नहीं था।यह लाखों मेहनतकश युवाओं के पक्ष में खड़े होने का संदेश भी था।

आज भी उत्तराखंड के अनेक अभ्यर्थी इस कानून को उस बदलाव के रूप में देखते हैं जिसने यह भरोसा जगाया कि मेहनत का मूल्य सुरक्षित रह सकता है।

Gen Z और वैचारिक संवाद

आज की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा 2014 से पहले के भारत की परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं रखता। इसलिए उसके लिए आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक परिवर्तन का मूल्यांकन अलग संदर्भों में होता है। यही कारण है कि किसी भी दल के लिए केवल उपलब्धियाँ गिनाना पर्याप्त नहीं है। यह समझाना भी आवश्यक है कि परिवर्तन किस पृष्ठभूमि में हुआ और उसका उद्देश्य क्या था। इसी संदर्भ में युवा शक्ति संवाद जैसे कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वे सरकार और युवाओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद का माध्यम बनते हैं।

क्या भाजपा का अगला नैरेटिव युवा चेहरा तैयार हो रहा है?

भारतीय जनता पार्टी के पास संगठनात्मक रूप से मजबूत नेतृत्व की लंबी श्रृंखला है। लेकिन आने वाले वर्षों में उसे ऐसे नेताओं की भी आवश्यकता होगी जो नई पीढ़ी की भाषा, उसकी अपेक्षाओं और उसकी संवाद शैली को समझते हों। पुष्कर सिंह धामी इस संदर्भ में इसलिए अलग दिखाई देते हैं क्योंकि वे अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रशासनिक निर्णयों के साथ संवाद को भी प्राथमिकता देते हैं। उनकी शैली टकराव से अधिक सहभागिता की अधिक दिखाई देती है।

उत्तराखंड: एक राजनीतिक प्रयोगशाला?

उत्तराखंड भौगोलिक दृष्टि से छोटा राज्य हो सकता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यहाँ कई ऐसे निर्णय हुए हैं जिनकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई। उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड में पिछले वर्ष सितंबर माह में नकल के मुद्दे पर CJP जैसा युवाओं का एक बड़ा आंदोलन देहरादून में हुआ किंतु पुष्कर सिंह धामी ने लीडरशिप का प्रत्यक्ष उदाहरण देते हुए राजनीतिक रूप से विरोधी संगठनों के नेतृत्व वाले आंदोलन के मंच पर पहुंच कर युवाओं की सभी समस्याओं को त्वरित समाधान प्रस्तुत किया।

जिसने विरोध करने वाले युवाओं को भी धामी की स्पष्टवादिता और युवाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखकर उनका क़ायल बना दिया। अगर कानून बनाने और लागू करने की फ़ेहरिस्त पर ध्यान दिया जाए तो बहुत ही सामान्य तरीक़े से किंतु प्रभावशाली निर्णय लेते हुए उत्तराखंड में रेखांकित करने वाले कानून लागू हुए।

समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य।
नकल विरोधी कठोर कानून।
निवेश और पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास।
युवाओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद आधारित कार्यक्रम।

इन पहलों ने राज्य को केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रयोगों के स्तर पर भी चर्चा में रखा है।

भविष्य की राजनीति का सूत्र

आने वाले दशक की राजनीति केवल चुनावी रैलियों से तय नहीं होगी। वह तय होगी कौन युवाओं को सुनता है,कौन कठिन निर्णय लेने का साहस रखता है और कौन अपने निर्णयों का तर्क सीधे जनता के सामने रख सकता है।

यदि नेतृत्व नीतियाँ,संवाद और भरोसा।इन तीनों को साथ लेकर चलता है, तो वह केवल सरकार नहीं चलाता, बल्कि राजनीतिक संस्कृति भी गढ़ता है।

पुष्कर सिंह धामी का राजनीतिक मूल्यांकन समय करेगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उन्होंने उत्तराखंड में शासन को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहने दिया। UCC जैसे निर्णय, नकल विरोधी कानून जैसी पहल और युवाओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद की शैली ने उन्हें समकालीन भाजपा के उन नेताओं में शामिल कर दिया है जिन पर राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

यदि भारतीय जनता पार्टी आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी के साथ वैचारिक संवाद को अपनी प्राथमिकता बनाती है, तो उत्तराखंड का “धामी मॉडल” उस दिशा में एक अध्ययन का विषय अवश्य बन सकता है।

क्योंकि अंततः लोकतंत्र में केवल सरकारें नहीं, बल्कि विश्वास की निरंतरता सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होती है और उस विश्वास का सबसे मजबूत आधार संवाद है।

(लेखक दस्तक टाइम्स के संपादक हैं)

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