ईरान की खाड़ी देशों को सीधी चेतावनी, अमेरिका की मदद की तो युद्ध में शामिल माना जाएगा; होर्मुज पर भी सख्त रुख

तेहरान: ईरान ने खाड़ी देशों को अमेरिका के साथ किसी भी तरह का सैन्य सहयोग करने को लेकर कड़ी चेतावनी दी है। ईरानी सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही ने कहा कि अगर खाड़ी देशों ने अमेरिकी सैन्य बलों को किसी भी तरह की मदद या सुविधा उपलब्ध कराई तो इसे युद्ध में अमेरिका का साथ देने के बराबर माना जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्रीय ठिकानों पर तैनात अमेरिकी सैन्य विमानों की मौजूदगी मेजबान देशों की जानकारी के बिना संभव नहीं है।
अमेरिकी सैन्य ठिकानों को लेकर ईरान का सख्त संदेश
ईरानी सैन्य नेतृत्व ने खाड़ी देशों से अमेरिकी सेना को किसी भी तरह का सहयोग नहीं देने को कहा है। ईरान का कहना है कि अमेरिकी सैन्य बलों को मदद या सुविधाएं उपलब्ध कराना सीधे तौर पर उसके खिलाफ युद्ध में शामिल होने जैसा होगा। इस चेतावनी के बीच अमेरिका के युद्ध के बाद खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को लेकर भी समीक्षा करने की खबर सामने आई है।
युद्ध के बाद खाड़ी में अमेरिकी सैनिक घट सकते हैं
एक अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त होने के बाद अमेरिका खाड़ी देशों में तैनात अपने सैनिकों की संख्या कम करने पर विचार कर सकता है। हमलों में क्षतिग्रस्त हुए अमेरिकी सैन्य ठिकानों को दोबारा बनाया जाए या नहीं, इस पर भी विचार किया जा रहा है।
होर्मुज से तेल टैंकरों की आवाजाही हुई धीमी
मध्य पूर्व में जारी तनाव का असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर भी दिखाई दे रहा है। बुधवार को सामने आए आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार को इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से केवल छह पोत गुजरे। इससे एक दिन पहले यह संख्या नौ थी, जबकि पिछले 10 दिनों में औसतन 11 जहाज प्रतिदिन इस रास्ते से गुजरे थे।
युद्ध से पहले दुनिया के कुल कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के शिपमेंट का करीब पांचवां हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता था। ऐसे में इस मार्ग पर आवाजाही धीमी होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ी है।
ईरान ने अस्थायी संघर्ष विराम का प्रस्ताव ठुकराया
ईरान ने अमेरिका के साथ एक और अस्थायी संघर्ष विराम के प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। ईरान अब युद्ध के स्थायी अंत की मांग कर रहा है। गल्फ न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक 60 दिनों के अंतरिम समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक प्रयासों में भी रुकावट आई है।
17 अगस्त को खत्म हुई 60 दिन की समय सीमा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की ओर से 17 जून को हस्ताक्षरित इस्लामाबाद समझौता पत्र में सैन्य अभियानों को तत्काल रोकने और अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत के लिए 60 दिनों की अवधि तय की गई थी। इसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होनी थी।
हालांकि, बिना किसी ठोस सफलता और समय सीमा बढ़ाए यह अवधि 17 अगस्त को समाप्त हो गई। इसके बाद अमेरिका और ईरान दोनों ने एक-दूसरे पर समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए हैं।
ईरान बोला- संघर्ष विराम नहीं, युद्ध का स्थायी अंत चाहिए
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने समझौते को संघर्ष विराम के बजाय युद्ध का अंत बताया है। उन्होंने कहा कि ईरान को अभी यह तय करना है कि अमेरिका के साथ सीधी बातचीत दोबारा शुरू की जाए या नहीं।
वहीं, ईरानी संसद के अध्यक्ष और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गलीबाफ ने कहा है कि जब तक अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी नहीं हटाता, तेल प्रतिबंध समाप्त नहीं करता, जब्त की गई ईरानी संपत्तियां जारी नहीं करता और सैन्य धमकियां खत्म नहीं करता, तब तक होर्मुज बंद रहेगा।



