ट्रंप की अनिश्चितता के बीच मोदी की नई वैश्विक चाल, एक-एक समझौते से भारत बना रहा विकल्पों का मजबूत जाल

नई दिल्ली: The New York Times में 29 अगस्त 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट केअनुसार,जिसका शीर्षक है “Modi Is Hedging Against Trump, One Deal at a Time”। रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क यह है कि भारत अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय यूरोप, एशिया और अन्य देशों के साथ-साथ एक आर्थिक, रक्षा और रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।
एक वर्ष तक दुनिया भर की यात्राओं के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने विभिन्न देशों के साथ समझौते किए हैं, क्योंकि अमेरिका अब पहले जितना भरोसेमंद साझेदार नहीं रह गया है।
फ्रांस, न्यूजीलैंड, सेशेल्स, मलेशिया, स्लोवाकिया, इटली…
पिछले एक वर्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद तेज गति से दुनिया के विभिन्न देशों की यात्राएँ की हैं। उनका उद्देश्य नए साझेदार बनाना और पुराने संबंधों को मजबूत करना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके पीछे एक कठोर वास्तविकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पैदा की गई वैश्विक आर्थिक एवं रणनीतिक अस्थिरता से निपटने और भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारत को अपने विकल्पों का दायरा व्यापक करना होगा।
अगस्त 2025 से प्रधानमंत्री मोदी कम-से-कम 20 देशों की आधिकारिक यात्राएँ कर चुके हैं और आने वाले दिनों में भी उनकी यात्राएँ जारी रहने वाली हैं। इनमें उज्बेकिस्तान और उसके बाद किर्गिस्तान की यात्रा शामिल है, जहाँ वे शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मिल सकते हैं।
इन यात्राओं से भारत को कई आर्थिक लाभ मिले हैं।जर्मनी से पनडुब्बी तकनीक, फ्रांस से छात्रों के लिए वीजा और ब्रिटेन से स्कॉच व्हिस्की पर कम शुल्क जैसे समझौते इसका उदाहरण हैं।
महाराष्ट्र सरकार से जुड़े Future Economic Cooperation Council की कार्यकारी निदेशक प्रियं गांधी-मोदी के अनुसार भारत की रणनीति “plurilateral” है। अर्थात एक साथ किसी एक बड़े गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ छोटे, लक्षित और विशिष्ट उद्देश्यों पर समझौते करना।
अमेरिका के साथ तनाव ने बदली रणनीति

रिपोर्ट के अनुसार भारत की इस पुनर्संतुलित विदेश नीति की शुरुआत लगभग एक वर्ष पहले हुई, जब ट्रंप ने फरवरी में वैश्विक स्तर पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाए। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने भारत की संरक्षणवादी व्यापार नीति की आलोचना की और रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया। अमेरिका का तर्क था कि रूसी तेल की खरीद से यूक्रेन युद्ध को आर्थिक मदद मिल रही है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में मोदी और ट्रंप के बीच व्यक्तिगत संबंध काफी मजबूत रहे थे और भारत को उम्मीद थी कि यह व्यक्तिगत समीकरण रणनीतिक लाभ में बदलेगा। लेकिन मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच चार दिन चले संघर्ष को समाप्त कराने में अपनी भूमिका का ट्रंप द्वारा बार-बार दावा किए जाने के बाद नई दिल्ली का रुख बदल गया।
इसके बाद भारत ने नए साझेदार तलाशने तेज कर दिए। इसका एक कारण यह भी है कि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एकल निर्यात बाजार रहा है। साथ ही भारत ने जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे उन देशों के साथ संबंध मजबूत किए हैं जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित करना चाहते हैं।
ईरान युद्ध ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के 80 प्रतिशत कच्चे तेल के आयात का रास्ता होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, इसलिए भारत को वैकल्पिक परिवहन मार्गों की तलाश करनी पड़ रही है।
- मोदी सरकार किन देशों के साथ क्या कर रही है?
रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर से प्रधानमंत्री मोदी ने 18 देशों की यात्रा की है, जबकि 13 देशों के नेता भारत आ चुके हैं। इन बैठकों से कई विशिष्ट समझौते सामने आए हैं।
फ्रांस
भारत और फ्रांस के संबंधों में AI और गवर्नेंस प्रमुख क्षेत्र बन रहे हैं। दोनों देश अगले पाँच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना चाहते हैं।
नॉर्वे
नॉर्वे ने भारत में 10 लाख रोजगार पैदा करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। यह European Free Trade Association के साथ भारत के समझौते से जुड़ा है।
दक्षिण कोरिया
राष्ट्रपति ली जे-म्यंग ने भारत में निवेश और शिपबिल्डिंग सहायता का आश्वासन दिया है। भारत 2047 तक दुनिया के शीर्ष पाँच जहाज निर्माण देशों में शामिल होना चाहता है।

न्यूजीलैंड
मोदी चार दशक में न्यूजीलैंड जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। बातचीत में समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करने पर जोर रहा।
यूरोपीय संघ
भारत ने जनवरी में यूरोपीय संघ के साथ एक बड़ा Free Trade Agreement किया। करीब दो दशक से चल रही वार्ता वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण तेज हुई।
- भारत की नई विदेश नीति की असली प्राथमिकताएँ
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है।
भारत की वर्तमान प्राथमिकताओं को छह क्षेत्रों में बांटा गया है:
- रक्षा तकनीक
- क्षेत्रीय सुरक्षा
- ऊर्जा आयात
- महत्वपूर्ण खनिज
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
- भारतीयों के लिए विदेशों में पढ़ाई और रोजगार के अवसर
रिपोर्ट के अनुसार इन सभी का उद्देश्य भविष्य के भू-राजनीतिक झटकों से बचने के लिए मजबूत आर्थिक गलियारे और वैकल्पिक साझेदारियाँ तैयार करना है।
यही भारत की पारंपरिक “Strategic Autonomy” यानी रणनीतिक स्वायत्तता का आधुनिक रूप है।
अब भारत किसी एक शक्ति के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अमेरिका, यूरोप, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग साझेदारी बना रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार हाल के समझौते पहले की तुलना में ज्यादा लक्षित, परिणाम आधारित और संख्यात्मक लक्ष्य वाले हैं। इनमें विनिर्माण रोजगार, तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और भारतीय फार्मास्यूटिकल्स के लिए नए बाजार शामिल हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण बदलाव—भारत का आर्थिक संरक्षणवाद से बाहर आना
रिपोर्ट यूरोपीय संघ के साथ समझौते को विशेष महत्व देती है।
भारत ने यूरोपीय कारों और शराब सहित कई उत्पादों पर टैरिफ कम करने की सहमति दी है। वहीं 2025 में ब्रिटेन के साथ समझौते में ब्रिटेन ने भारतीय कपड़ों पर शुल्क कम किया और भारत ने शराब पर शुल्क घटाया।
अर्थात भारत अब केवल “Make in India के लिए संरक्षण” की नीति पर निर्भर नहीं है, बल्कि बड़े वैश्विक बाजारों तक भारतीय उद्योग की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए Reciprocal Trade Agreements की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

- रिपोर्ट का अमेरिका संबंधी निष्कर्ष
रिपोर्ट में Chatham House के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ Chietigj Bajpayee के हवाले से कहा गया है कि भारत-अमेरिका संबंध इस समय “flux” में हैं और उनमें रणनीतिक फोकस की कमी दिखाई देती है। मोदी और ट्रंप की G7 के दौरान हुई मुलाकात को उन्होंने संबंधों को गहरा करने वाली प्रक्रिया के बजाय “one-off coffee” जैसा बताया।
उनका निष्कर्ष है कि अमेरिका के साथ भरोसेमंद संबंध न होने की स्थिति में भारत फिर ऐसी रणनीति अपना रहा है जिसमें वह छोटे देशों, कनाडा-जापान जैसी middle powers और अमेरिका-चीन जैसी बड़ी शक्तियों के बीच अपने हितों का संतुलन बनाए रखता है।
- रिपोर्ट का गहरा विश्लेषण
मेरे आकलन में रिपोर्ट को केवल “मोदी बनाम ट्रंप” के रूप में पढ़ना इस रिपोर्ट के वास्तविक संदेश को छोटा कर देगा।
असल कहानी है-भारत की Strategic Diversification
भारत ने यह समझ लिया है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
अमेरिका से-
टेक्नोलॉजी + निवेश + बाजार + Indo-Pacific security
रूस से-
ऊर्जा + रक्षा संबंध
फ्रांस से-
डिफेंस + AI + यूरोप में रणनीतिक साझेदारी
जापान/ऑस्ट्रेलिया से-
Indo-Pacific + China balancing
दक्षिण कोरिया से-
शिपबिल्डिंग + निवेश
यूरोप से-
विशाल बाजार + FTA + technology
और मध्य एशिया से-
कनेक्टिविटी + ऊर्जा + रणनीतिक पहुँच
यानी भारत की नीति है:
“किसी एक ध्रुव का हिस्सा मत बनो; सभी ध्रुवों से अपने हित के अनुसार संबंध रखो।”
रिपोर्ट स्वयं इसे भारत की Strategic Autonomy के रूप में रेखांकित करती है।
- रिपोर्ट में मोदी की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण सकारात्मक संकेत
रिपोर्ट का सबसे मजबूत तथ्य यह है कि मोदी की विदेश यात्राओं को केवल Diplomatic Photo Opportunities के रूप में नहीं देखा गया है।
रिपोर्ट बार-बार इस बात पर जोर देती है कि हाल की बैठकों में:
Specific Goals + Specific Targets + Specific Numbers
तय किए जा रहे हैं।
यही इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक संदेश है।

उदाहरण के लिए-
1 million jobs
Trade doubling
Top 5 shipbuilding nation by 2047
ये केवल कूटनीतिक घोषणाएँ नहीं हैं; इन्हें आर्थिक नीति के measurable outcomes के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- लेकिन रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण कमजोरी भी है
यहाँ राजनीतिक/मीडिया विश्लेषण के स्तर पर एक बात ध्यान देने योग्य है।
रिपोर्ट का शीर्षक ही है:
“Modi Is Hedging Against Trump”
अर्थात पूरी कहानी को काफी हद तक Trump factor के चश्मे से प्रस्तुत किया गया है।
जबकि रिपोर्ट में मौजूद तथ्य इससे कहीं बड़ी कहानी बताते हैं।
भारत केवल ट्रंप से बचाव नहीं कर रहा।
भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए:
नए बाजार + नई technology + नए supply chains + energy security + defence technology + critical minerals + manufacturing investment
का वैश्विक नेटवर्क बना रहा है। Blank 69.pdf
इसलिए अधिक व्यापक शीर्षक शायद यह होता:
“India’s New Global Strategy: Diversify, De-risk and Grow”
यानी:
“भारत की नई वैश्विक रणनीति—विविधीकरण, जोखिम कम करना और विकास।”
- भारत के लिए इसका रणनीतिक अर्थ
इस रिपोर्ट से पाँच बड़े निष्कर्ष निकलते हैं:
① अमेरिका महत्वपूर्ण है, लेकिन अपरिहार्य नहीं
भारत अमेरिका को छोड़ नहीं रहा है। बल्कि अमेरिकी अनिश्चितता के कारण alternative options बढ़ा रहा है।
② चीन के मुकाबले भारत अपनी global positioning मजबूत कर रहा है
जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और यूरोप के साथ बढ़ते संबंध केवल व्यापारिक नहीं हैं; इनमें Indo-Pacific और supply-chain security का तत्व भी है।
③ रूस से संबंध तोड़ने की बजाय संतुलित करने की कोशिश
भारत पश्चिम के साथ संबंध बढ़ाते हुए रूस के साथ भी संपर्क बनाए रख रहा है। SCO में पुतिन से मुलाकात इसका संकेत है।
④ विदेश नीति अब सीधे घरेलू आर्थिक विकास से जुड़ रही है
Defence technology, manufacturing, jobs, pharmaceuticals, shipbuilding, AI और critical minerals- इन सभी को विदेश नीति के केंद्र में रखा गया है।
⑤ 2047 की अर्थव्यवस्था के लिए Global Partnerships
रिपोर्ट में 2047 का लक्ष्य केवल राजनीतिक नारा नहीं बल्कि shipbuilding जैसे क्षेत्रों के measurable targets से जुड़ा दिखाई देता है।
- राजनीतिक रूप से इसका इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है?
यदि इस रिपोर्ट को भारत सरकार/भाजपा के दृष्टिकोण से narrative building के लिए इस्तेमाल करना हो, तो सबसे प्रभावी लाइन यह हो सकती है:
“दुनिया बदल रही है, इसलिए भारत भी अपनी रणनीति बदल रहा है। भारत किसी एक देश की छाया में खड़ा होने के बजाय दुनिया के हर महत्वपूर्ण शक्ति-केंद्र के साथ अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर साझेदारी कर रहा है।”
और इसे और राजनीतिक धार देते हुए:
“मोदी की विदेश नीति अब केवल संबंध बनाने की नीति नहीं है; यह भारत की आर्थिक, ऊर्जा, रक्षा और तकनीकी सुरक्षा के लिए पूरी दुनिया में विकल्प तैयार करने की नीति है।”
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि NYT की रिपोर्ट स्वयं इस बात को स्वीकार करती है कि भारत ने हाल के वर्षों की तुलना में अधिक targeted, measurable और economic-outcome oriented diplomacy अपनाई है।
एक पंक्ति में रिपोर्ट का सार:
“मोदी ट्रंप से दूरी नहीं बना रहे हैं; भारत किसी भी एक शक्ति पर निर्भरता का जोखिम कम कर रहा है और इसी प्रक्रिया में भारत अपनी वैश्विक रणनीतिक स्वायत्तता को आर्थिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहा है।”
यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें आलोचनात्मक अमेरिकी मीडिया दृष्टिकोण के बावजूद भारत की multi-alignment, strategic autonomy और economic diplomacy को एक ठोस और संगठित रणनीति के रूप में स्वीकार किया गया है।








