एक मीटिंग, कई संदेश और भारत के लिए बड़े मायने, नेतन्याहू का UAE दौरा क्यों है खास?

नई दिल्ली: इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अबू धाबी पहुंचे और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय हुई जब ईरान, हूती हमलों और गाजा संकट के बीच मध्य पूर्व में सुरक्षा को लेकर दबाव बना हुआ है। अब्राहम समझौते के बाद इजराइल और यूएई के रिश्ते व्यापार, तकनीक, पर्यटन और सुरक्षा तक बढ़ चुके हैं। ऐसे में दोनों नेताओं की मुलाकात को क्षेत्रीय रिश्तों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
इस बैठक का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत के इजराइल और यूएई दोनों के साथ करीबी संबंध हैं। खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्ग और प्रस्तावित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा इन संबंधों से जुड़े हुए हैं।
बैठक में कौन-कौन शामिल हुआ?
हिंदुस्तान टाइम्स के एग्जीक्यूटिव एडिटर शिशिर गुप्ता के अनुसार, नेतन्याहू 27 सितंबर को एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अबू धाबी पहुंचे थे। उनके साथ उनकी पत्नी के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख, मोसाद प्रमुख तथा राजनीतिक और सैन्य सलाहकार भी थे।
यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने नेतन्याहू का स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच लंबी बातचीत हुई। इसमें द्विपक्षीय संबंधों, ईरान, क्षेत्रीय सुरक्षा और मध्य पूर्व की स्थिति पर चर्चा होने की जानकारी सामने आई।
गुप्ता के अनुसार, बैठक की अहम बात यह रही कि इजराइल और यूएई अपने रणनीतिक संबंधों को सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाते दिखाई दिए। 2020 में अब्राहम समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, पर्यटन, खुफिया सहयोग और रक्षा संबंध बढ़े हैं।
अब्राहम समझौते के बाद कितना बदला रिश्ता?
2020 में हुआ अब्राहम समझौता इजराइल और कुछ अरब देशों के बीच संबंध सामान्य करने की दिशा में बड़ा कदम था। यूएई इस समझौते में प्रमुख रूप से शामिल था। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ा तथा पर्यटन और सुरक्षा सहयोग भी आगे बढ़ा।
हालांकि गाजा युद्ध, ईरान से जुड़े तनाव और हूती हमलों ने क्षेत्रीय परिस्थितियों को बदल दिया है। ऐसे माहौल में नेतन्याहू का अबू धाबी पहुंचना दोनों देशों के बीच संपर्क और सहयोग जारी रहने का संकेत माना जा रहा है।
गुप्ता के अनुसार, इस बैठक से यह भी संकेत मिलता है कि सुरक्षा और आर्थिक हितों के बीच इजराइल-यूएई संपर्क अभी सक्रिय है।
बैठक से ईरान और क्षेत्र को क्या संदेश?
इस मुलाकात को कई संदेशों से जोड़कर देखा जा रहा है। इनमें एक संदेश ईरान से जुड़ा है। यूएई खाड़ी क्षेत्र का बड़ा आर्थिक और व्यापारिक केंद्र है, जहां कंपनियों, बंदरगाहों, ऊर्जा कारोबार और अंतरराष्ट्रीय निवेश की बड़ी भूमिका है।
पिछले वर्षों में यूएई को सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। इनमें यमन में सक्रिय हूती समूह के हमले शामिल हैं। हूती समूह को ईरान का समर्थन मिलने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे माहौल में इजराइल के साथ यूएई का सार्वजनिक संपर्क उसकी सुरक्षा साझेदारी को सामने रखता है।
दूसरा संदेश क्षेत्र में बदलते गठबंधनों से जुड़ा है। यह बैठक यूएई की स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका को भी सामने लाती है। यूएई अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए इजराइल के साथ संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।
इजराइल-यूएई संबंधों को लेकर क्या संकेत मिला?
इजराइल की घरेलू राजनीति और कुछ रिपोर्टों के आधार पर दोनों देशों के नेतृत्व के बीच तनाव को लेकर चर्चाएं हुई थीं। लेकिन नेतन्याहू और शेख मोहम्मद बिन जायद की उच्च स्तरीय मुलाकात से दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर संपर्क कायम होने का संकेत मिलता है।
बैठक को इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच संपर्क केवल औपचारिक स्तर तक सीमित नहीं दिख रहा है।
ईरान, हूती और खाड़ी की सुरक्षा क्यों अहम है?
बैठक की पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय सुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा है। ईरान से जुड़े सशस्त्र समूहों को लेकर इजराइल, खाड़ी देशों और अमेरिका की चिंताएं रही हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूती को इसी व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा तस्वीर से जोड़ा जाता है।
यूएई पहले भी मिसाइल और ड्रोन हमलों का सामना कर चुका है। ऐसे हमलों से शहरों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और हवाई सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसलिए वायु रक्षा, खुफिया जानकारी साझा करने और खतरे की शुरुआती पहचान की क्षमता का महत्व बढ़ गया है।
इजराइल के पास ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल सहित हवाई खतरों से निपटने का अनुभव है। उसकी खुफिया और रडार क्षमताएं यूएई के लिए खतरे की पहचान और निगरानी में उपयोगी हो सकती हैं। इसी वजह से नेतन्याहू के दौरे को सुरक्षा सहयोग के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
क्षेत्र में तनाव का असर होर्मुज जलडमरूमध्य और दूसरे समुद्री मार्गों पर पड़ने की स्थिति में तेल निर्यात, जहाजरानी और व्यापार भी प्रभावित हो सकते हैं।
क्या बैठक में दूसरे अरब देश भी शामिल थे?
सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि सऊदी अरब, मोरक्को, लीबिया और कतर के प्रतिनिधि भी अबू धाबी में हुई बैठक से जुड़े हो सकते हैं। हालांकि शिशिर गुप्ता के अनुसार, अबू धाबी, तेल अवीव और वाशिंगटन से मिली जानकारी में अन्य अरब प्रतिनिधियों की मौजूदगी की पुष्टि नहीं हुई है।
उनके मुताबिक बैठक मुख्य रूप से नेतन्याहू और शेख मोहम्मद बिन जायद के बीच हुई थी। सऊदी अरब अभी आधिकारिक रूप से अब्राहम समझौते में शामिल नहीं हुआ है, हालांकि उसके इजराइल से जुड़े अपने संपर्क और रणनीतिक हित हो सकते हैं।
कतर की भी क्षेत्रीय कूटनीति में अलग भूमिका रही है और यूएई के साथ उसके संबंध जटिल रहे हैं। इसलिए अबू धाबी में बड़ी बहुपक्षीय बैठक में कई अरब देशों के शामिल होने की खबरों को पुष्टि के बजाय दावे और अनुमान के तौर पर देखा जा रहा है।



