
‘भक्ति आंदोलन और मराठा राज्य शासन पर प्रभाव’ पर नेशनल सेमिनार आयोजित
लखनऊ : कालीचरण पी. जी. कॉलेज, लखनऊ में सोमवार को’भक्ति आंदोलन और मराठा राज्य शासन पर उसका प्रभाव’ विषय पर प्रायोजित दो दिवसीय ‘नेशनल सेमिनार’ का आयोजन किया गया। सेमिनार के प्रथम दिवस कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण करके किया गया। सेमिनार के उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय के प्रबंधक इं. वी. के. मिश्र ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और अतिथियो का सभी से परिचय कराते हुए विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भक्ति आंदोलन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना थी। इसने मराठा राज्य शासन को तो प्रभावित किया ही, साथ ही भारतीय जनमानस को भी पूरी तरह से बदलने का कार्य किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे. पी. सैनी ने अपने उद्बोधन में विषय पर विस्तार से अपनी बात रखी और संगोष्ठी का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि धार्मिक और सामाजिक समरसता का इससे अच्छा उदाहरण नहीं मिल सकता। समाज को सुदृढ़ता प्रदान करने और आगे बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। इस आंदोलन ने क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ाने का कार्य किया। संतों की वाणी और उनके व्यक्तित्व ने शिवाजी जैसे महान राष्ट्रनायकों का निर्माण किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ओम जी उपाध्याय, निदेशक आईसीएचआर, नई दिल्ली ने विषय पर गम्भीरता से अपनी बात रखी और कहा कि भक्ति आंदोलन एक ऐसा सांस्कृतिक आंदोलन था, जिसने केवल धर्म को ही नहीं बल्कि हमारे साहित्य, संस्कृति, चिन्तनधारा, दर्शन और समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभावित किया। विष्णु पुराण’ का सन्दर्भ देते हुए कहा कि भारत सदा एक रहा है। जब हम इसे प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत में बाँटते हैं तो हम इसकी आत्मा से न्याय नहीं करते। यहाँ शासक बदले लेकिन यहाँ की संस्कृति और सामाजिक चेतना ने अपने मूल आधार को नहीं छोड़ा।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रो हिमांशु कुमार चतुर्वेदी,आईआईएएस, नई दिल्ली ने अपना बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि भारतीय इतिहास को भू-राजनीतिक के अलावा भू-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती संस्कृति और सभ्यता को बचाने की है। यह वह कालखण्ड है जब भारत अपने प्रतिरोध के साथ सामने आ रहा है। लॉर्ड मैकाले को कोट करते हुए कहा कि भारत सदैव शस्त्र और शास्त्र के समन्वय की बात करता है, लेकिन मैकाले ने यहाँ के साहित्य और संस्कृति को नकार कर राष्ट्र को विखण्डित ही बताया जो कदापि सत्य नहीं है। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो० चन्द्रमोहन उपाध्याय ने संगोष्ठी में आए हुए सभी अतिथियो और सहभागिता करने वाले शोधार्थियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का जन्म होता है और वह धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक चेतना को उद्वेलित कर देता है।
कार्यक्रम की संयोजिका प्रो. अर्चना मिश्रा ने कार्यक्रम की रूप-रेखा प्रस्तुत की और कहा कि इतिहास सदैव एक जैसा नहीं रहता वह साक्ष्यों से बनता है। कार्यक्रम का सफल संचालन हिन्दी के प्राध्यापक डॉ. अरुण यादव ने किया। उद्घाटन सत्र के उपरान्त तकनीकी सत्रों का भी संचालन किया गया। जिसमें दो ऑफलाइन, एक ऑनलाइन और एक “पैनल डिस्कशन” के रूप में संचालित हुए। प्रथम ऑफलाइन अकादमिक तकनीकी सत्र का संचालन डॉ. डी. सी. डी. आर. पाण्डेय और द्वितीय सत्र का संचालन प्रो. कल्याणी त्रिवेदी के निर्देशन में किया गया। ऑनलाइन तकनीकी सत्र का संचालन डॉ. मो. तनवीर के निर्देशन में किया गया। तकनीकी सत्रों में लगभग 70 शोधपत्रों का वाचन शोधार्थियों और शिक्षकों के द्वारा किया गया। प्रो० मीना कुमारी के निर्देशन में एक पैनल चर्चा का भी आयोजन कराया गया जिसमें महाविद्यालयों के प्राचार्यों और वरिष्ठ शिक्षकों ने सहभागिता की। आज संगोष्ठी के प्रथम दिवस पर 300 से अधिक शोधार्थियों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया।

महाविद्यालय की सांस्कृतिक समिति की समन्वयक डॉ. अलका द्विवेदी के निर्देशन में छात्राओं ने सरस्वती वंदना और स्वागत गीत की मनोरम प्रस्तुति दी। कार्यक्रम में लूटा के अध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार पाण्डेय और महामंत्री अंशु केडिया के साथ-साथ विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्या प्रो. मंजुला उपाध्याय, प्रो. वीना राय, प्रो० सुचिता पाण्डेय, प्रो० रीना पाठक सहित अन्य महाविद्यालयों के प्राध्यापकगण और महाविद्यालय के शिक्षक एवं भारी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।



