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कलावा किस हाथ में बांधना माना जाता है शुभ? पुरुषों और विवाहित महिलाओं के लिए जानें अलग-अलग नियम

Lucknow : हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान माथे पर तिलक लगाने के साथ कलाई पर कलावा बांधने की भी परंपरा है। इसे मौली या रक्षासूत्र भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में कलावे को शुभता और रक्षा का प्रतीक माना गया है। घर में पूजा, हवन या किसी शुभ कार्य की शुरुआत के समय इसे बांधना परंपरा का हिस्सा होता है। हालांकि, कलावा बांधने को लेकर पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग नियम बताए गए हैं। आइए जानते हैं कि किस हाथ में कलावा बांधना शुभ माना जाता है और इससे जुड़ी अन्य धार्मिक मान्यताएं क्या हैं।

पुरुषों और महिलाओं को किस हाथ में बांधना चाहिए कलावा?

धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पुरुषों और अविवाहित लड़कियों को दाएं हाथ की कलाई पर कलावा बांधना चाहिए। वहीं, विवाहित महिलाओं के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने की परंपरा बताई गई है।

इसके पीछे मान्यता है कि विवाह के बाद पत्नी को पति की वामांगिनी कहा जाता है। वामांगिनी का अर्थ पति के बाएं अंग का हिस्सा होना है। इसी धार्मिक धारणा के आधार पर विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में कलावा बांधना शुभ माना जाता है।

कलावा कलाई पर कितनी बार लपेटना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलावा बांधते समय इसे कलाई पर तीन, पांच या सात बार लपेटने की परंपरा है। इसे शुभता और रक्षा से जोड़कर देखा जाता है। साथ ही कलावे के तीन धागों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेव का प्रतीक भी माना जाता है।

कितने दिनों बाद उतारना चाहिए कलावा?

मान्यताओं के मुताबिक, कलावा करीब 21 दिनों बाद उतारा जा सकता है। यदि यह पुराना हो जाए, इसका रंग फीका पड़ जाए या यह अपने आप खुलने लगे तो इसे पहले भी हटाया जा सकता है। धार्मिक परंपरा में मंगलवार और शनिवार को कलावा उतारने के लिए शुभ दिन माना गया है।

पुराना कलावा उतारने के बाद क्या करना चाहिए?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पुराने कलावे को उतारने के बाद इधर-उधर फेंकने से बचना चाहिए। इसे पूजा सामग्री के साथ अलग रखकर उचित तरीके से विसर्जित किया जा सकता है। कुछ परंपराओं में पुराने कलावे को पीपल के पेड़ के नीचे रखने की मान्यता भी प्रचलित है।

पुराना कलावा उतारने के बाद नया कलावा बांधने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तरह रक्षासूत्र धारण करने की परंपरा को पूजा-पाठ और शुभ कार्यों से जोड़ा जाता है।

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