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MP में 1.47 लाख साल के पेड़ों पर संकट, डिंडोरी-मंडला में ‘साल हार्टवुड बोरर’ का कहर; संक्रमण रोकने के लिए कटाई अभियान

डिंडोरी: मध्य प्रदेश के डिंडोरी और मंडला जिलों में साल के जंगलों पर एक खतरनाक कीड़े का प्रकोप बढ़ गया है। ‘साल हार्टवुड बोरर’ नाम का यह कीड़ा पेड़ों को अंदर से खोखला कर देता है। जंगलों को इस संक्रमण से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रभावित 1.47 लाख साल के पेड़ों को काटने की मंजूरी दी है। इसके साथ ही कीड़ों को पकड़ने का अभियान भी चलाया जा रहा है। ग्रामीण हाथों से इन कीड़ों को पकड़कर प्रति कीड़ा 2 रुपये तक कमा रहे हैं।

साल के जंगलों के लिए बड़ी चुनौती बना ‘साल हार्टवुड बोरर’

डिंडोरी-मंडला मार्ग के आसपास साल के जंगलों में बड़ी संख्या में संक्रमित पेड़ों की कटाई की जा रही है। कटाई के बाद पेड़ों की छाल हटा दी जाती है, जिसके बाद ग्रामीण तनों पर नजर रखते हैं और बाहर निकलने वाले कीड़ों को पकड़ते हैं। इस कीड़े का वैज्ञानिक नाम ‘होप्लोसेराम्बिक्स स्पिनिकॉर्निस’ है। इसे ‘साल हार्टवुड बोरर’ कहा जाता है और यह लॉन्गहॉर्न बीटल की प्रजाति है।

ग्रामीण हाथों से पकड़ रहे कीड़े, एक बीटल के मिलते हैं 2 रुपये

यह कीड़ा लंबे समय से साल के पेड़ों के लिए खतरा बना हुआ है। ग्रामीण इन्हें हाथों से पकड़कर बैग में जमा करते हैं। इन बीटल के लंबे एंटीना से हार भी बनाए जाते हैं। पकड़े गए कीड़ों को जिले के आठ संग्रह केंद्रों तक पहुंचाया जाता है, जहां ग्रामीणों को प्रति बीटल 2 रुपये दिए जाते हैं।

इस मौसम में अब तक 19,25,118 बीटल जमा किए जा चुके हैं। इसके एवज में राज्य के वन विभाग पर करीब 38.5 लाख रुपये का खर्च आया है।

1.47 लाख संक्रमित पेड़ों की कटाई को मंजूरी

‘साल हार्टवुड बोरर’ का प्रकोप नया नहीं है। इस कीड़े को पहली बार वर्ष 1897 में दर्ज किया गया था। अब इसका संक्रमण बड़े स्तर पर फैलने के कारण डिंडोरी में बड़े पैमाने पर साल के पेड़ों की कटाई का अभियान चलाया जा रहा है। केंद्र सरकार ने संक्रमण से प्रभावित 1.47 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी दी है।

साल, जिसे ‘शोरिया रोबस्टा’ भी कहा जाता है, मध्य भारत के जंगलों की प्रमुख वृक्ष प्रजातियों में शामिल है। इसके जंगल मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी पाए जाते हैं।

आदिवासी समुदाय के लिए साल के पेड़ बेहद महत्वपूर्ण

साल की लकड़ी अपनी मजबूती और सड़न से बचने की क्षमता के लिए जानी जाती है। आदिवासी समुदाय का जीवन भी साल के पेड़ों और जंगलों से काफी हद तक जुड़ा हुआ है। साल के बीजों से तेल निकाला जाता है, जिसका इस्तेमाल खाना पकाने, साबुन और मिठाई बनाने में किया जाता है।

इसके पत्तों से दोने बनाए जाते हैं, जबकि तने से निकलने वाली राल का इस्तेमाल धूप के तौर पर किया जाता है। यही वजह है कि साल के जंगलों का आदिवासी समुदाय के लिए आर्थिक उपयोग के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है।

देश में 21 से ज्यादा बार सामने आ चुका है साल बोरर का प्रकोप

साल हार्टवुड बोरर को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में अब तक 21 से ज्यादा बार प्रकोप दर्ज किया जा चुका है। मध्य प्रदेश और पड़ोसी छत्तीसगढ़ में वर्ष 1997 से 2000 के बीच भी इसका गंभीर असर देखने को मिला था।

डिंडोरी से लगे मंडला जिले में भी प्रभावित पेड़ों की कटाई के आदेश दिए गए हैं। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए पेड़ों की कटाई के साथ कीड़ों को पकड़ने का अभियान भी चलाया जा रहा है।

पेड़ काटने के बाद तीन दिन तक छोड़े जाते हैं तने

संक्रमित खड़े पेड़ों को काटना इस प्रकोप को नियंत्रित करने के उपायों में शामिल है। बारिश के मौसम में कीड़ों को पकड़ने का अभियान तेज किया जाता है। संक्रमित और पूरी तरह खराब हो चुके पेड़ों को काटने के बाद उनकी छाल हटा दी जाती है, ताकि अंदर छिपे कीड़े बाहर निकल सकें।

कटाई और छाल हटाने के बाद पेड़ों के तनों को करीब तीन दिन तक छोड़ दिया जाता है। इस दौरान कीड़े बाहर निकलते हैं और रात के समय इन्हें देखा जा सकता है। सुबह ग्रामीण बाहर आए कीड़ों को हाथ से पकड़कर बैग में जमा करते हैं और फिर संग्रह केंद्रों तक पहुंचाते हैं।

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