अद्धयात्मजीवनशैली

पिंडदान के समय कौवा बना था साक्षी, फिर माता सीता ने क्यों दिया श्राप? जानें गया से जुड़ी पूरी पौराणिक कथा

गया: पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। इस दौरान कौवे को भोजन कराने का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में कौवे को पितरों का स्वरूप और यमराज का दूत माना गया है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में कौवे को भोजन कराकर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार, इसी कौवे को कभी माता सीता के श्राप का सामना करना पड़ा था।

मान्यता है कि इस कथा का संबंध बिहार के गया में राजा दशरथ के पिंडदान से है। कहा जाता है कि पिंडदान के दौरान फल्गु नदी, गाय, कौवा, ब्राह्मण और केतकी के फूल समेत कुछ साक्षी मौजूद थे। जब पिंडदान की सच्चाई बताने की बारी आई तो इन साक्षियों ने माता सीता का साथ नहीं दिया और असत्य कहा। इससे नाराज होकर माता सीता ने उन्हें श्राप दिया।

वनवास के दौरान गया पहुंचीं माता सीता

पौराणिक कथा के अनुसार, वनवास के समय पितृ पक्ष में भगवान राम और लक्ष्मण राजा दशरथ का पिंडदान करने के लिए गया पहुंचे थे। दोनों भाई पिंडदान की सामग्री जुटाने के लिए चले गए। इसी बीच शाम होने लगी और माता सीता को लगा कि पिंडदान का शुभ समय निकल सकता है।

समय कम होता देख माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे ही पिंडदान करने का निर्णय लिया। उन्होंने रेत से पिंड बनाए और फल्गु नदी, वटवृक्ष, गाय, कौवे और एक ब्राह्मण को इस धार्मिक कर्म का साक्षी बनाया। इसके बाद उन्होंने विधि-विधान से राजा दशरथ का पिंडदान किया।

राम ने साक्षियों से पूछा सच

जब भगवान राम और लक्ष्मण वापस लौटे तो उन्हें बताया गया कि माता सीता राजा दशरथ का पिंडदान कर चुकी हैं। भगवान राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने वहां मौजूद साक्षियों से पूछा कि क्या वास्तव में माता सीता ने पिंडदान किया था।

कथा के अनुसार, भगवान राम के क्रोध के डर से फल्गु नदी, गाय, कौवा और ब्राह्मण समेत अन्य साक्षियों ने सच्चाई बताने के बजाय पिंडदान होने से इनकार कर दिया। यह देखकर माता सीता नाराज हो गईं।

सच न बताने पर कौवे को मिला श्राप

मान्यता के अनुसार, जब माता सीता ने देखा कि कौवे ने भी सत्य का साथ नहीं दिया और पिंडदान से इनकार कर दिया, तो उन्होंने उसे श्राप दे दिया। कथा में कहा गया है कि माता सीता ने कौवे को श्राप दिया कि वह चाहे कितना भी भोजन कर ले, उसका पेट कभी नहीं भरेगा।

इसी वजह से कौवे के झुंड में भोजन करने या भोजन के दौरान आपस में झगड़ने को भी इस कथा से जोड़ा जाता है। कुछ मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि माता सीता ने कौवे को आकस्मिक मृत्यु का श्राप दिया था।

गाय को भी दिया श्राप और वरदान

पिंडदान की सच्चाई छिपाने वाले साक्षियों में गाय का भी नाम आता है। कथा के अनुसार, माता सीता ने गाय को श्राप दिया कि उसका मुख हमेशा अपवित्र माना जाएगा और वह जूठन खाने वाली मानी जाएगी।

हालांकि, माता सीता ने गाय को पूरी तरह अशुभ नहीं माना। उन्होंने उसे वरदान भी दिया कि उसके शरीर और दूसरे अंगों को पवित्र माना जाएगा। इसी धार्मिक मान्यता के कारण हिंदू धर्म में गाय और उससे मिलने वाले गोबर तथा मूत्र को भी पवित्र और पूजनीय माना जाता है।

पितृ पक्ष में आज भी कौवे को क्यों खिलाया जाता है?

कौवे को श्राप मिलने की इस पौराणिक कथा के बावजूद पितृ पक्ष में उसे भोजन कराने की परंपरा आज भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है। इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौवे को खिलाने की परंपरा है।

मान्यता है कि कौवे के रूप में पितर भोजन ग्रहण करते हैं और इससे पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। यही कारण है कि पितृ पक्ष के दौरान घर के आसपास कौवे का आना और उसे भोजन कराना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

Related Articles

Back to top button