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राहुल गांधी की ‘सरप्राइज पॉलिटिक्स’ से सियासी हलचल, अचानक धरना से बैरिकेड तक… सड़क पर उतरकर सीधा सरकार को घेरने की रणनीति

नई दिल्ली: राहुल गांधी की हालिया राजनीति में अचानक लिए जाने वाले फैसले और सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज कराने का तरीका लगातार चर्चा में है। कभी अचानक धरने पर बैठना, कभी पुलिस थाने पहुंचना तो कभी तय कार्यक्रम से अलग रास्ते पर आगे बढ़ जाना—पिछले कुछ समय में उनके विरोध प्रदर्शनों में ऐसे कई मौके सामने आए हैं। इसे कांग्रेस की बदली हुई विरोध शैली के तौर पर देखा जा रहा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शन में भी राहुल गांधी इसी अंदाज में नजर आए। 6 अक्टूबर को निर्धारित मार्च को पुलिस ने रोक दिया, जिसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और विपक्षी नेताओं ने आकाशवाणी भवन के पास धरना शुरू कर दिया। करीब आठ घंटे तक चले प्रदर्शन के बाद पुलिस ने राहुल गांधी समेत अन्य नेताओं को हिरासत में लिया। अगले दिन भी उन्होंने जंतर-मंतर की ओर मार्च करने की कोशिश की, जिसके बाद उन्हें फिर हिरासत में लिया गया।

अचानक कदम उठाने पर जोर

राहुल गांधी की हालिया राजनीतिक गतिविधियों में अचानक फैसला लेने और विरोध के संदेश को सीधे सड़क पर उतारने का तरीका दिखाई देता है। कई मौकों पर उनके साथ बड़ा जमावड़ा होने के बजाय सीमित संख्या में नेता और कार्यकर्ता नजर आए हैं। वहीं, कुछ घटनाओं में राहुल गांधी खुद विरोध की अगली कतार में दिखाई दिए।

हालिया प्रदर्शन के दौरान भी बैरिकेडिंग वाले रास्ते पर उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की। एक मौके पर वह बैरिकेड पर चढ़ते हुए हाथ में तिरंगा लिए नजर आए। इसके बाद चुनाव आयोग के पास धरना देने का फैसला किया गया। घटनाक्रम का यह तरीका पुलिस की पहले से तय व्यवस्था से अलग था।

2011 में भी दिख चुका है ऐसा अंदाज

राहुल गांधी की यह शैली पूरी तरह नई नहीं है। 2011 के भट्टा-पारसौल किसान आंदोलन के दौरान भी वह अचानक ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल गांव पहुंच गए थे। वह तड़के मोटरसाइकिल से वहां पहुंचे और पुलिस की मौजूदगी के बीच किसानों से मुलाकात की। इसके बाद वह किसानों के साथ धरने पर बैठे और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

हालांकि, उस समय इस तरह के कदम कभी-कभार देखने को मिलते थे। हाल के महीनों में अचानक मौके पर पहुंचकर विरोध दर्ज कराने की घटनाएं उनकी राजनीतिक गतिविधियों में ज्यादा दिखाई दी हैं।

मार्शल आर्ट्स से भी जोड़ते रहे हैं अपनी रणनीति

राहुल गांधी पहले अपनी राजनीतिक सोच को मार्शल आर्ट्स से जोड़कर बात कर चुके हैं। वह मार्शल आर्ट्स की अलग-अलग विधाओं का अभ्यास करते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी दिनभर पैदल चलने के बाद उन्होंने यात्रियों के साथ मार्शल आर्ट्स का अभ्यास किया था।

उनकी ओर से बताई गई सोच में परिस्थितियों के मुताबिक प्रतिक्रिया देने और सीधे टकराव से अलग तरीके अपनाने की बात दिखाई देती है। हालांकि, उनकी मौजूदा राजनीतिक रणनीति को सीधे मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षण का परिणाम मानना एक विश्लेषण है, स्थापित तथ्य नहीं।

लंबे धरने और मार्च में फिटनेस की भूमिका

लगातार सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करना शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। राहुल गांधी कई मौकों पर अपनी दिनचर्या में व्यायाम को महत्व देने की बात कर चुके हैं। लंबे मार्च, घंटों तक धरना और पुलिस के साथ आमने-सामने की स्थिति में लगातार सक्रिय रहना उनके मौजूदा विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बना हुआ है।

कांग्रेस की सड़क पर उतरकर राजनीति करने की शैली में राहुल गांधी की यह सक्रिय भूमिका इन प्रदर्शनों को ज्यादा प्रत्यक्ष बनाती है।

धरने की जगह छोड़ने के बजाय डटे रहने का रुख

हालिया प्रदर्शनों में राहुल गांधी के रुख का एक पहलू यह भी रहा है कि मांग पूरी होने तक प्रदर्शन स्थल पर बने रहने की कोशिश की गई। प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ने से लेकर संसद मार्ग पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग तक, अलग-अलग मौकों पर उन्होंने कार्रवाई पूरी होने तक वहां रहने का रुख अपनाया।

चुनाव आयोग के खिलाफ हालिया प्रदर्शन में भी उन्होंने आयोग के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की मांग को लेकर धरना जारी रखा। विपक्ष का कहना था कि वह चुनाव आयोग से सीधे बातचीत करना चाहता है। वहीं, आयोग की ओर से तय प्रक्रिया और प्रोटोकॉल के तहत मुलाकात की बात कही गई। इसी मतभेद के चलते प्रदर्शन और ज्यादा चर्चा में आया।

राहुल गांधी के करीबी नेताओं का कहना रहा है कि वह हर राजनीतिक कदम को नफा-नुकसान के हिसाब से तय नहीं करते। उनके अनुसार, वह जिसे सही मानते हैं, उसके लिए आगे बढ़ते हैं, भले ही उसका राजनीतिक असर कुछ भी हो। यह उनके समर्थकों का आकलन है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

मोदी की स्थापित छवि के बीच अलग राजनीतिक पहचान की कोशिश

राहुल गांधी के सामने चुनौती सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान को मजबूत करने की भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक छवि के बीच राहुल गांधी की हालिया गतिविधियों में सड़क पर उतरकर विरोध दर्ज कराने और प्रत्यक्ष राजनीतिक टकराव की स्थिति में मौजूद रहने का तरीका अधिक दिखाई देता है।

इसी वजह से राजनीतिक हलकों में उनकी शैली को नरेंद्र मोदी की राजनीति के मुकाबले एक अलग पहचान बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, यह राजनीतिक विश्लेषण और धारणा का विषय है, कोई स्थापित तथ्य नहीं।

आगे राहुल गांधी की इस तरह की विरोध राजनीति का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा, यह आने वाले चुनावों और जनता की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होगा। फिलहाल उनके हालिया प्रदर्शनों में यह जरूर दिख रहा है कि वह कांग्रेस के आंदोलन और विरोध कार्यक्रमों में खुद को केवल भाषण देने वाले नेता के बजाय सीधे मौके पर मौजूद रहने वाले नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं।

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