दिन में बिल्कुल सामान्य, रात होते ही हो जाते थे बेबस! पाकिस्तान के ‘सोलर किड्स’ आज भी मेडिकल साइंस की सबसे बड़ी पहेलियों में शामिल

इस्लामाबाद: चिकित्सा विज्ञान ने कई दुर्लभ और जटिल बीमारियों का इलाज खोज लिया है, लेकिन कुछ मामले ऐसे हैं जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के दो भाइयों का मामला भी इन्हीं अनसुलझी मेडिकल पहेलियों में गिना जाता है। दिनभर पूरी तरह सामान्य जीवन जीने वाले ये बच्चे जैसे ही शाम होती, अचानक इतनी कमजोरी महसूस करने लगते कि न चल पाते, न बोल पाते और न ही अपने शरीर पर नियंत्रण रख पाते। इसी रहस्यमयी स्थिति के कारण उन्हें दुनिया भर में “सोलर किड्स” के नाम से पहचान मिली।
दिन के समय दोनों भाई अन्य बच्चों की तरह स्कूल जाते, खेलते-कूदते और सामान्य गतिविधियों में हिस्सा लेते थे। लेकिन सूर्यास्त के बाद उनकी शारीरिक स्थिति तेजी से बदल जाती थी। कुछ ही समय में वे चलने-फिरने, बोलने और हाथ-पैर तक हिलाने में असमर्थ हो जाते थे। इस असामान्य बदलाव ने लंबे समय तक उनके परिवार को भी हैरान रखा और बीमारी की वजह समझ से बाहर रही।
डॉक्टरों के सामने भी बनी चुनौती
इलाज के लिए जब दोनों बच्चों को इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज ले जाया गया तो डॉक्टरों ने इसे बेहद दुर्लभ मामला माना। कई तरह की चिकित्सीय जांच और परीक्षण किए गए, लेकिन शुरुआती जांचों में बीमारी का स्पष्ट कारण सामने नहीं आ सका। विशेषज्ञों का कहना था कि उन्होंने अपने चिकित्सा जीवन में इससे पहले ऐसा मामला नहीं देखा था।
क्या सूरज की रोशनी से था कोई संबंध?
बच्चों के पिता का मानना था कि उनके बेटों को ऊर्जा सूरज की रोशनी से मिलती है और सूर्यास्त के बाद उनकी ताकत खत्म हो जाती है। इस दावे की जांच के लिए डॉक्टरों ने बच्चों को दिन के समय पूरी तरह अंधेरे कमरे में भी रखा, लेकिन उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। इसके बाद विशेषज्ञ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि बीमारी का सीधा संबंध सूर्य की रोशनी से साबित नहीं होता। हालांकि, इसी धारणा के चलते उन्हें “सोलर किड्स” नाम से पहचान मिल गई।
दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी की जताई गई आशंका
विशेषज्ञों ने संभावना जताई कि दोनों भाई किसी अत्यंत दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल विकार से पीड़ित हो सकते हैं, जो नसों और मांसपेशियों के कामकाज को प्रभावित करता है। इसकी पुष्टि के लिए बच्चों के रक्त के नमूने विदेश की प्रयोगशालाओं में भेजे गए। इसके अलावा उनके गांव की मिट्टी और हवा के नमूनों की भी जांच कराई गई, ताकि किसी पर्यावरणीय कारण की संभावना को भी परखा जा सके। हालांकि, इन सभी प्रयासों के बावजूद बीमारी की निश्चित वजह का पता नहीं चल सका।
परिवार की पृष्ठभूमि ने भी बढ़ाए सवाल
दोनों बच्चे बलूचिस्तान के एक छोटे से गांव के निवासी हैं। उनके माता-पिता रिश्ते में चचेरे भाई-बहन हैं। परिवार में कुल छह बच्चे थे, जिनमें से दो की कम उम्र में ही मृत्यु हो गई थी। वहीं बाकी भाई-बहनों में इस तरह के लक्षण कभी नहीं दिखाई दिए। यही वजह रही कि डॉक्टरों के लिए यह समझना और भी कठिन हो गया कि यह समस्या केवल इन दो बच्चों में ही क्यों दिखाई दी।
दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने दिखाई दिलचस्पी
इस अनोखे मामले ने अंतरराष्ट्रीय मेडिकल समुदाय का भी ध्यान अपनी ओर खींचा। कई शोधकर्ताओं ने इसे दुर्लभ बीमारियों के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण माना। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों पर लगातार शोध से भविष्य में आनुवंशिक और न्यूरोलॉजिकल विकारों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।
आज भी बरकरार है यह रहस्यमयी मेडिकल पहेली
चिकित्सा विज्ञान में लगातार हो रही प्रगति के बावजूद पाकिस्तान के इन दोनों भाइयों का मामला आज भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। दिनभर सामान्य रहना और शाम ढलते ही शरीर का अचानक निष्क्रिय हो जाना आज भी दुनिया के सबसे रहस्यमयी मेडिकल मामलों में शामिल माना जाता है। इसी वजह से “सोलर किड्स” की कहानी आज भी वैज्ञानिकों और आम लोगों के बीच जिज्ञासा का विषय बनी हुई है।



