US Fed ने बढ़ाई ब्याज दर, महंगाई पर लगाम की कोशिश; 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी, आगे भी सख्ती के संकेत

वाशिंगटन: अमेरिका में लगातार ऊंची बनी महंगाई के बीच फेडरल रिजर्व ने बुधवार को बेंचमार्क ब्याज दर में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की। फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) ने दर को 3.75 से 4 फीसदी की लक्ष्य सीमा तक बढ़ाने के फैसले को 12-0 से मंजूरी दी। यह जुलाई 2023 के बाद पहली बार है जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर बढ़ाई है। फेड ने कहा कि महंगाई अभी भी ऊंची बनी हुई है और यह कदम उसे 2 फीसदी के लक्ष्य की ओर समय पर वापस लाने में मदद करेगा।
फेड का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार कम ब्याज दरों की मांग करते रहे हैं। नई दर व्यवस्था के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कर्ज की लागत बढ़ने का असर होम लोन, ऑटो लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे कर्ज पर भी पड़ सकता है। फेड के सितंबर के अनुमानों में 2026 के दौरान एक और 0.25 फीसदी दर बढ़ोतरी का संकेत दिया गया है।
महंगाई को लेकर फेड का क्या कहना है?
फेडरल रिजर्व ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर है। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य महंगाई को 2 फीसदी तक लाना है। फेड के मुताबिक आर्थिक गतिविधियां ठोस गति से बढ़ रही हैं, घरेलू खर्च मजबूत बना हुआ है और उत्पादकता तथा पूंजी निवेश में भी मजबूती है। ऐसे में मौद्रिक नीति के जरिए कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश जारी रखी जा रही है।
केविन वॉश के कार्यकाल में पहली दर बढ़ोतरी
यह फेड के नए चेयरमैन केविन वॉश के कार्यकाल में ब्याज दर बढ़ाने का पहला फैसला है। सितंबर की बैठक में दर बढ़ाने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। रॉयटर्स के अनुसार, वॉश ने महंगाई को नियंत्रित करने की जरूरत पर जोर दिया और फेड की नीतिगत स्वतंत्रता को बनाए रखने का रुख रखा।
आगे भी ब्याज दर बढ़ने के संकेत
फेड के ताजा अनुमानों में 2026 के अंत तक एक और 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का संकेत मिला है। हालांकि, आगे की मौद्रिक नीति आर्थिक आंकड़ों और महंगाई की स्थिति पर निर्भर करेगी। फेड की अगली बैठक 27-28 अक्तूबर को निर्धारित है।
वैश्विक बाजारों पर भी असर
अमेरिकी ब्याज दर में बढ़ोतरी का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी दिखाई दिया। रॉयटर्स के मुताबिक फेड के फैसले के बाद अमेरिकी शेयर बाजारों में गिरावट देखी गई, जबकि डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में मजबूती आई। भारत समेत दूसरे देशों के बाजारों में भी अमेरिकी मौद्रिक नीति के फैसलों पर नजर रहती है, क्योंकि इससे वैश्विक पूंजी प्रवाह और वित्तीय परिस्थितियों पर असर पड़ सकता है।



