“हम माइग्रेंट नहीं, कश्मीर छोड़ने को हुए मजबूर”, नावलेकर समिति के सामने कश्मीरी पंडितों ने सुनाया 36 साल का दर्द

जम्मू। प्रवासी शिविर जगती में मंगलवार को कश्मीरी पंडितों ने नावलेकर समिति के सामने अपने विस्थापन की पीड़ा और लंबे समय से लंबित मांगों को रखा। समुदाय के लोगों ने कहा कि उन्हें ‘माइग्रेंट’ कहना उनकी त्रासदी की वास्तविकता को कम करके आंकना है। उनका कहना था कि वे रोजगार या बेहतर जीवन की तलाश में जम्मू नहीं आए थे, बल्कि आतंक, लक्षित हत्याओं, धमकियों और उत्पीड़न के बीच अपनी जान बचाने के लिए पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हुए।
समिति जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े मामलों की जानकारी लेने के लिए सोमवार को जम्मू पहुंची थी और बुधवार को भी प्रदेश में रहेगी। समिति के कश्मीर के कुछ हिस्सों का दौरा करने की संभावना है। इसके बाद वह पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जाएगी, जहां भी जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े मुद्दे सामने आने की बात कही जा रही है।
13 सूत्री ज्ञापन में रखीं बड़ी मांगें
जगती जेनोसाइड विक्टिम्स एंड सर्वाइवर्स कॉलोनी ने समिति को 13 सूत्री ज्ञापन सौंपा। इसमें 1989-90 के दौरान कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा और जबरन विस्थापन को औपचारिक रूप से मान्यता देने की मांग की गई।
प्रवासियों की ओर से पनुन कश्मीर संगठन के विधिक सलाहकार एडवोकेट विश्व रंजन पंडिता ने समिति के सामने समुदाय का पक्ष रखा। उन्होंने नरसंहार को लेकर अलग कानून या व्यापक कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग की। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में विस्थापित समुदाय के लिए अलग, सुरक्षित और संरक्षित होमलैंड को स्थायी समाधान बताया गया। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडित विस्थापित नहीं, बल्कि निष्कासित हुए हैं।
राहत नहीं, अधिकार और सम्मान की मांग
पनुन कश्मीर ने समिति से कहा कि 35 वर्ष से अधिक समय से विस्थापित परिवार शिविरों, कॉलोनियों और किराये के मकानों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। संगठन ने मौजूदा 3250 रुपये मासिक नकद राहत को महंगाई के अनुरूप बढ़ाने और भविष्य में इसे लागत-ए-जीवन सूचकांक से जोड़ने की मांग की।
संगठन के मुताबिक राहत को स्थायी समाधान नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि लंबे विस्थापन के दौरान राज्य की अंतरिम जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। 1991 के मार्गदर्शन प्रस्ताव का हवाला देते हुए संगठन ने कश्मीरी हिंदुओं की सम्मानजनक वापसी और पुनर्वास के लिए राजनीतिक ढांचे के साथ घाटी में संविधान के तहत अलग मातृभूमि की मांग भी दोहराई।
20 हजार सरकारी नौकरियां और 3-बीएचके मकानों की मांग
विस्थापन के कारण रोजगार के अवसर गंवाने वाले युवाओं के लिए केंद्र सरकार से कम से कम 15 हजार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन से पांच हजार अतिरिक्त सरकारी नौकरियां देने की मांग रखी गई। इसके अलावा उम्र सीमा में विशेष छूट, योग्यता में आवश्यक राहत और अधिक उम्र पार कर चुके युवाओं के लिए एकमुश्त मुआवजा तथा पुनर्वास पैकेज की मांग भी की गई।
जगती समेत अन्य विस्थापित कॉलोनियों में परिवारों के बढ़ते आकार और पुराने मकानों की स्थिति को देखते हुए पात्र परिवारों के लिए नए 3-बीएचके मकान बनाने की मांग की गई। वहीं किराये के मकानों में रह रहे विस्थापित परिवारों के लिए जम्मू में कम से कम एक हजार फ्लैट बनाने का प्रस्ताव भी समिति के सामने रखा गया।
वापसी के साथ न्याय, सुरक्षा और संपत्ति की बहाली की मांग
कश्मीरी पंडित विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में विशेष प्रवेश व्यवस्था, छात्रवृत्ति और फीस में रियायत देने की मांग की गई। पीएम पैकेज कर्मचारियों के लिए समान सेवा सुविधाएं देने के साथ विस्थापित परिवारों की संपत्तियों, मंदिरों और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण तथा पुनर्स्थापन के लिए व्यापक व्यवस्था की मांग भी उठाई गई।
समुदाय ने कहा कि घाटी में वापसी केवल घर लौटने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके साथ न्याय, सुरक्षा, सम्मान और संपत्ति की बहाली सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
जगती को सिर्फ कॉलोनी नहीं, विस्थापन की पीड़ा के तौर पर देखने की मांग
एडवोकेट विश्व रंजन पंडिता ने समिति से कहा कि जगती का दौरा केवल कॉलोनी की सुविधाओं और ढांचे के निरीक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यहां की अधूरी सुविधाओं और जर्जर ढांचे के पीछे उस बड़े मानवीय संकट को भी देखा जाना चाहिए, जिसमें एक समुदाय अपने घरों से उजड़ने के बाद दशकों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
उन्होंने केंद्र सरकार तक जगती की आवाज पहुंचाने की मांग करते हुए कहा कि राहत को न्याय का विकल्प, पुनर्वास को संपत्ति की पुनर्बहाली का विकल्प और कल्याणकारी योजनाओं को औपचारिक पहचान का विकल्प नहीं माना जा सकता। समुदाय ने 36 वर्ष बाद कश्मीरी हिंदुओं के मुद्दे के समाधान के लिए कानून, न्याय, गरिमा और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर आधारित व्यापक राष्ट्रीय नीति की जरूरत बताई।



