अद्धयात्मजीवनशैली

पितृपक्ष में दोपहर को ही क्यों किया जाता है श्राद्ध? शास्त्रों में बताया गया है खास कारण, जानें सही विधि

नई दिल्ली: पितृपक्ष को पितरों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का समय माना जाता है। इन दिनों पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाना चाहिए। वहीं, अगर मृत्यु की तिथि की जानकारी न हो तो अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। आपने अक्सर देखा होगा कि श्राद्धकर्म दोपहर के समय ही किया जाता है। इसके पीछे शास्त्रीय मान्यताओं से जुड़े कई कारण बताए गए हैं।

दोपहर को ही क्यों किया जाता है श्राद्ध?

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार दिन के अलग-अलग पहरों को अलग-अलग प्रकार के कार्यों से जोड़ा गया है। सुबह और शाम का समय देव कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। वहीं, घोर अंधकार को आसुरी और नकारात्मक शक्तियों की सक्रियता से जोड़ा गया है।

दोपहर का समय पितरों को समर्पित माना जाता है। इसी वजह से पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म दोपहर के समय करना श्रेष्ठ माना जाता है।

पितृलोक को लेकर क्या है मान्यता?

शास्त्रों में पितृलोक की स्थिति को लेकर भी विशेष वर्णन मिलता है। मान्यता है कि पितृलोक मृत्युलोक और देवलोक के बीच तथा चंद्रमा के ऊपर स्थित है। दिन का मध्य समय पितरों को समर्पित माना जाता है। इसी कारण इस पहर में पितरों को भोजन अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।

सूर्य की किरणों से भोजन ग्रहण करने की मान्यता

श्राद्ध भोज को दोपहर में कराने के पीछे एक अन्य लोक मान्यता भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, सूर्य देव पूर्व दिशा से उदित होकर दोपहर तक आकाश के मध्य में पहुंचते हैं।

कहा जाता है कि पितर सूर्य की किरणों के माध्यम से पृथ्वी लोक पर श्राद्ध में अर्पित भोजन ग्रहण करते हैं। इसी वजह से दोपहर के समय को श्राद्ध कर्म के लिए उपयुक्त माना जाता है।

पितृपक्ष में श्राद्ध की सही विधि क्या है?

पितृपक्ष में जिस तिथि को श्राद्ध करना हो, उस दिन घर की दक्षिण दिशा में पितरों के निमित्त पूजा करने की परंपरा है। इसके बाद तिल मिले जल से तर्पण किया जाता है। पिंडदान कर कुश के आसन पर बैठकर पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

इसके बाद श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण को सात्विक भोजन कराने की परंपरा है। इस दौरान गाय, कौवा, कुत्ता और चींटी के लिए भी अलग-अलग भोजन निकालकर रखने की मान्यता है। इसे पंचबलि कहा जाता है।

श्राद्ध के भोजन में किन बातों का रखें ध्यान?

श्राद्ध के भोजन को सात्विक रखने की परंपरा है। इसमें प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद उन्हें वस्त्र और दक्षिणा देने तथा उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा है।

अंत में पितरों से किसी तरह की भूल हुई हो तो उसके लिए क्षमा मांगने की मान्यता है। शाम के समय दक्षिण दिशा में सरसों के तेल का दीपक जलाने की भी परंपरा बताई गई है।

Related Articles

Back to top button