
नई दिल्ली। पेट के आसपास बढ़ती चर्बी को अक्सर लोग सिर्फ वजन बढ़ने की समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हो सकती है। लंबे समय तक बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी और जरूरत से अधिक कैलोरी वाला भोजन शरीर में अतिरिक्त वसा जमा होने का कारण बन सकता है। खासकर कमर और पेट के आसपास बढ़ने वाली चर्बी का संबंध इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज के बढ़ते जोखिम से देखा गया है।
जब शरीर जितनी ऊर्जा खर्च करता है, उससे अधिक कैलोरी लगातार मिलती रहती है तो अतिरिक्त ऊर्जा वसा के रूप में जमा होने लगती है। लगातार वजन बढ़ना और खासकर कमर के आसपास चर्बी बढ़ना मेटाबॉलिक सिंड्रोम और टाइप-2 डायबिटीज जैसी समस्याओं के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा पाया गया है। इसलिए केवल वजन मशीन पर दिखाई देने वाले आंकड़े पर निर्भर रहने के बजाय कमर के बढ़ते घेरे और अपनी पूरी जीवनशैली पर भी ध्यान देना जरूरी है।
पेट की चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस का क्या है संबंध
ब्लड शुगर शरीर के लिए ऊर्जा का जरूरी स्रोत है, लेकिन लंबे समय तक इसका स्तर सामान्य से अधिक रहने पर शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं। इसके कारण ग्लूकोज का इस्तेमाल प्रभावित हो सकता है और ब्लड शुगर बढ़ने की स्थिति बन सकती है।
शरीर में अतिरिक्त फैटी एसिड का बोझ बढ़ने पर मांसपेशियों और लिवर में ग्लूकोज के इस्तेमाल की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इससे इंसुलिन की कार्यप्रणाली पर असर पड़ सकता है। हालांकि यह प्रभाव हर व्यक्ति में समान नहीं होता। आनुवंशिकता, उम्र, नींद, तनाव, खानपान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई दूसरे कारक भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।
लगातार बढ़ी ब्लड शुगर से बढ़ सकता है कई बीमारियों का खतरा
लंबे समय तक ब्लड शुगर का स्तर अधिक रहने पर रक्त वाहिकाओं और नसों को नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ सकता है। डायबिटीज का लंबे समय तक खराब नियंत्रण हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी की बीमारी और आंखों से जुड़ी जटिलताओं के खतरे को भी बढ़ा सकता है।
यही वजह है कि लगातार बढ़ते वजन या कमर के घेरे को केवल बाहरी रूप-रंग से जोड़कर देखना सही नहीं है। शरीर में होने वाले इन बदलावों को मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के संदर्भ में भी समझना जरूरी है।
रोजाना शारीरिक गतिविधि से कम किया जा सकता है जोखिम
मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि महत्वपूर्ण है। तेज चाल से चलना, साइकिल चलाना, तैराकी या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी गतिविधियां नियमित रूप से की जा सकती हैं। सामान्य स्वास्थ्य लाभ के लिए वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि और कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधियां करने की सलाह दी जाती है।
सिर्फ व्यायाम शुरू करना ही पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहने की आदत को कम करना और दिनभर में गतिविधियों को बढ़ाना भी उपयोगी हो सकता है।
खानपान में भी करना होगा जरूरी बदलाव
भोजन में संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अत्यधिक मीठे पेय और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना बेहतर है। भोजन में सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन जैसे पौष्टिक विकल्प शामिल किए जा सकते हैं।
सिर्फ किसी एक खाद्य पदार्थ को छोड़ देना या लंबे समय तक भूखा रहना हर व्यक्ति के लिए जरूरी या उपयुक्त उपाय नहीं है। खासकर डायबिटीज, गर्भावस्था या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन की सलाह लेनी चाहिए।
कमर का घेरा और ब्लड शुगर बढ़ रहा है तो कराएं जांच
अगर वजन लगातार बढ़ रहा है, कमर का घेरा बढ़ रहा है या बार-बार ब्लड शुगर सामान्य से अधिक मिल रहा है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते चिकित्सकीय जांच कराना और खानपान, शारीरिक गतिविधि तथा वजन पर ध्यान देना मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद कर सकता है।
यह भी समझना जरूरी है कि केवल सुबह 20 मिनट पैदल चलने, किसी एक खास डाइट या किसी एक उपाय से हर व्यक्ति में पेट की चर्बी और ब्लड शुगर तेजी से कम होने की गारंटी नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी बदलाव व्यक्ति की स्थिति और जरूरत के अनुसार किए जाने चाहिए।



