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पश्चिम बंगाल में OBC प्रमाणपत्रों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, 2025-26 में जारी सर्टिफिकेट की वैधता पर होगा फैसला

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC प्रमाणपत्रों की वैधता को लेकर चल रहा कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें मई 2025 से मई 2026 के बीच तय अवधि में जारी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका को इसी मुद्दे से जुड़ी एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया है। अब मामले में संबंधित पक्षों के जवाब और दलीलों के आधार पर आगे की सुनवाई होगी।

सरकारी पद खाली रखने से कोर्ट का इनकार

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से आग्रह किया गया कि मामले का अंतिम फैसला आने तक कुछ रिक्त सरकारी पदों पर नियुक्तियां नहीं की जाएं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी पदों को खाली नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले के दायरे में आने वाली नियुक्तियां सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रहेंगी। साथ ही सफल उम्मीदवारों को जारी होने वाले नियुक्ति पत्रों में भी इस संबंध में स्पष्ट शर्त शामिल करने को कहा गया है।

2010 के बाद OBC आरक्षण को लेकर शुरू हुआ विवाद

पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद लंबे समय से चल रहा है। मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य की OBC सूची और OBC-A तथा OBC-B वर्गीकरण से जुड़े कई प्रावधानों को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के एक आदेश में भी इस फैसले के तहत 2010 के बाद जारी OBC-A और OBC-B प्रमाणपत्रों को लेकर स्थिति का उल्लेख किया गया था।

इसके बाद राज्य सरकार ने मई और जून 2025 में OBC आरक्षण से संबंधित नई अधिसूचनाएं जारी कीं। हालांकि, 17 जून 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने इन अधिसूचनाओं के संचालन पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि कार्यकारी आदेशों के जरिए उसके पहले के फैसले को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

2025-26 में जारी प्रमाणपत्र भी सवालों के घेरे में

12 अगस्त 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले में अप्रैल 2026 में जारी OBC-A प्रमाणपत्र को भी अमान्य माना। कोर्ट के मुताबिक यह प्रमाणपत्र मई-जून 2025 की उन अधिसूचनाओं के आधार पर जारी हुआ था, जिन्हें पहले ही अमान्य ठहराया जा चुका था।

हाईकोर्ट ने कहा था कि 8 मई 2025 से 12 जून 2025 के बीच जारी OBC प्रमाणपत्रों के अलावा 10 जून 2025 से 18 मई 2026 के बीच जारी प्रमाणपत्र भी प्रभावहीन और शून्य माने जाएंगे। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं।

सरकार की अधिसूचनाओं और प्रमाणपत्रों को लेकर कानूनी पेंच

मामले की जड़ मई 2024 के कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ी है। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से OBC सूची और आरक्षण व्यवस्था में बदलाव के लिए कई अधिसूचनाएं जारी की गईं। इन अधिसूचनाओं की वैधता पर भी अदालत में चुनौती दी गई।

बाद में राज्य सरकार की ओर से पहले की कानूनी चुनौती वापस लिए जाने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने पुराने आदेशों के प्रभाव को फिर से लागू माना। इसी कानूनी स्थिति के आधार पर मई 2025 से मई 2026 के बीच जारी प्रमाणपत्रों की वैधता पर सवाल उठा।

अंतिम फैसला आने तक बनी रहेगी असमंजस की स्थिति

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसलिए विवादित अवधि में जारी OBC प्रमाणपत्रों की अंतिम वैधता को लेकर अभी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है।

अदालत ने सरकारी नियुक्तियों को पूरी तरह रोकने के बजाय उन्हें लंबित मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रखने का निर्देश दिया है। ऐसे में संबंधित उम्मीदवारों और भर्ती प्रक्रियाओं पर अंतिम प्रभाव सुप्रीम कोर्ट के आगामी आदेशों के आधार पर तय होगा।

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