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मंगल पर पानी नहीं फिर भी हर सुबह बनता है 1800 KM लंबा दानवी बादल, दोपहर तक क्यों हो जाता है गायब? जानिए इस अनोखी फिजिक्स का पूरा राज

नई दिल्ली: मंगल ग्रह को बेहद सूखा और बंजर ग्रह माना जाता है, लेकिन इसी लाल ग्रह पर हर सुबह करीब 1800 किलोमीटर लंबा एक विशाल सफेद बादल दिखाई देता है। हैरानी की बात यह है कि कुछ ही घंटों बाद यह बादल दोपहर से पहले तेजी से गायब भी हो जाता है। वैज्ञानिकों ने नए कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए इस रहस्य को समझने की कोशिश की है और पाया कि इसके पीछे ऐसी भौतिक प्रक्रिया काम कर रही है, जिसे धरती के सामान्य मौसम विज्ञान से नहीं समझाया जा सकता।

मंगल पर रोज बनता है 1800 KM लंबा बादल

वैज्ञानिकों ने इस रहस्यमय बादल को अर्सिया मॉन्स एलॉन्गेटेड क्लाउड यानी एएमईसी नाम दिया है। यह मंगल के दक्षिणी गोलार्ध में बसंत और गर्मियों के दौरान लगातार दिखाई देता है। इसका फैलाव करीब 1100 मील यानी लगभग 1800 किलोमीटर तक होता है। यह दूरी धरती पर न्यूयॉर्क से मियामी के बीच की दूरी के बराबर बताई गई है।

मंगल की पूरी गोलाई के हिसाब से देखें तो यह बादल ग्रह के करीब 12वें हिस्से जितनी दूरी तक फैला दिखाई देता है। सबसे दिलचस्प बात इसकी रोजाना होने वाली गतिविधि है। सुबह यह धीरे-धीरे बनना शुरू होता है, सूरज चढ़ने के साथ इसका आकार बढ़ता जाता है और दोपहर से पहले ही यह तेजी से वाष्पीकृत होकर मंगल के बेहद पतले वायुमंडल में गायब हो जाता है।

20 KM ऊंचे ज्वालामुखी के ऊपर बनता है यह बादल

एएमईसी मंगल के थार्सिस इलाके में मौजूद अर्सिया मॉन्स नाम के एक शांत ज्वालामुखी के ऊपर बनता है। इस ज्वालामुखी की ऊंचाई करीब 20 किलोमीटर यानी लगभग 12 मील है। यह धरती के माउंट एवरेस्ट से दोगुने से भी ज्यादा ऊंचा है।

जब मंगल की सतह पर तेज हवाएं चलती हैं तो अर्सिया मॉन्स की विशाल ढलान इन हवाओं के रास्ते में रुकावट पैदा करती है। हवा पहाड़ से टकराकर ऊपर की ओर तेजी से उठती है और अपने साथ नमी को भी ऊंचाई तक ले जाती है। धरती पर पहाड़ों से टकराकर बनने वाले बादलों को ओरोग्राफिक क्लाउड कहा जाता है।

हालांकि मंगल का यह बादल धरती पर बनने वाले ऐसे बादलों से काफी अलग है। इसकी असाधारण लंबाई और बेहद कम समय में बनने और गायब होने की प्रक्रिया ने वैज्ञानिकों को लंबे समय तक उलझाए रखा।

धरती के बादल बनने का नियम मंगल पर क्यों फेल हुआ?

धरती के वायुमंडल में बादल बनने की सामान्य प्रक्रिया को हेटेरोजेनियस न्यूक्लिएशन कहा जाता है। इसमें पानी की भाप को बूंद या बर्फ के क्रिस्टल में बदलने के लिए किसी छोटे कण की जरूरत होती है।

हवा में मौजूद धूल, नमक, पराग या कालिख जैसे बारीक कण पानी की भाप को अपने चारों ओर जमने का आधार देते हैं। इसी प्रक्रिया से बादल बनते हैं। मंगल पर भी धूल की कोई कमी नहीं है और वहां लगातार धूल भरी आंधियां चलती रहती हैं।

लेकिन वैज्ञानिकों ने जब इसी प्रक्रिया को कंप्यूटर मॉडल में इस्तेमाल किया तो एएमईसी के वास्तविक स्वरूप से नतीजे मेल नहीं खाए। इससे संकेत मिला कि मंगल के इस विशाल बादल को बनने के लिए कोई दूसरी प्रक्रिया जिम्मेदार है।

क्या है होमोजेनियस न्यूक्लिएशन की अनोखी प्रक्रिया?

वैज्ञानिकों ने इसके बाद होमोजेनियस न्यूक्लिएशन नाम की उस प्रक्रिया पर ध्यान दिया, जिसे अब तक मुख्य रूप से सैद्धांतिक संभावना माना जाता था। इस प्रक्रिया में पानी की भाप को किसी धूल या दूसरे कण की जरूरत नहीं पड़ती।

रिसर्च टीम के मुताबिक, पानी की भाप सीधे बर्फ के क्रिस्टल में बदल सकती है। यानी बादल बनने के लिए किसी बाहरी कण को आधार बनाने की जरूरत नहीं होती। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी ग्रह के वायुमंडल में होमोजेनियस न्यूक्लिएशन के वास्तविक रूप से काम करने का यह पहला उदाहरण है।

सिर्फ 10 मिनट में 30 डिग्री गिरता है तापमान

होमोजेनियस न्यूक्लिएशन के लिए मंगल पर बेहद असामान्य परिस्थितियां बनती हैं। इसके लिए हवा में नमी का स्तर सामान्य से करीब एक लाख गुना अधिक होना जरूरी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब हवा अर्सिया मॉन्स की ढलान से ऊपर उठती है तो एक शक्तिशाली लहर बनती है। यह हवा को बेहद तेज गति से ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचाती है। इस दौरान महज 10 मिनट के भीतर हवा का तापमान करीब 30 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है।

इतनी तेजी से तापमान गिरने पर हवा की सापेक्ष आर्द्रता लाखों गुना बढ़ जाती है। इसी अचानक बदलाव के कारण पानी की भाप सीधे बर्फ के कणों में बदल जाती है और विशाल सफेद बादल का निर्माण शुरू हो जाता है।

मंगल जैसे सूखे ग्रह पर पानी आता कहां से है?

इस रहस्य का एक और अहम हिस्सा यह है कि इतने बड़े बादल के लिए पानी की भाप आती कहां से है। मंगल के वायुमंडल में पानी की मात्रा बेहद कम है। रिसर्च टीम ने इसके दो मुख्य स्रोत बताए हैं।

पहला स्रोत मंगल के पतले वायुमंडल में मौजूद पानी की भाप के वे छोटे अंश हैं जो सतह के पास मौजूद रहते हैं। दूसरा और बड़ा स्रोत अर्सिया मॉन्स की चोटी पर जमा पाले की मोटी परत है।

सुबह सूरज की पहली किरणें जब ज्वालामुखी की चोटी पर पड़ती हैं तो वहां जमा पाला तेजी से पिघलकर भाप में बदलने लगता है। ऊपर उठती हवा इस भाप को अपने साथ ऊंचाई पर ले जाती है। कुछ ही मिनटों में यह भाप जमकर 1800 किलोमीटर लंबा विशाल बादल बना देती है।

मार्स एक्सप्रेस ने सालों तक की इस बादल की निगरानी

इस रहस्यमय प्रक्रिया को समझने में यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मार्स एक्सप्रेस ऑर्बिटर की अहम भूमिका रही है। इस अंतरिक्ष यान ने 2018 में पहली बार इस बादल की तस्वीर दुनिया के सामने रखी थी।

मार्स एक्सप्रेस में लगे विजुअल मॉनिटरिंग कैमरा, हाई रेजोल्यूशन स्टीरियो कैमरा और ओमेगा स्पेक्ट्रोमीटर ने इस बादल की गतिविधियों को बारीकी से ट्रैक किया। दूसरे कई अंतरिक्ष यान इस बादल को आसानी से नहीं देख पाते, क्योंकि उनकी कक्षा ऐसी नहीं है कि वे सुबह के समय अर्सिया मॉन्स के इलाके को सीधे देख सकें।

मार्स एक्सप्रेस ने सालों तक इस बादल की निगरानी की और अलग-अलग समय पर इसमें होने वाले बदलावों को दर्ज किया। इसी लंबे अवलोकन और कंप्यूटर सिमुलेशन ने वैज्ञानिकों को इसके बनने की प्रक्रिया समझने में मदद की।

मंगल ने फिर दिखाया कि अंतरिक्ष का मौसम धरती से कितना अलग है

वैज्ञानिकों को पहले लगता था कि होमोजेनियस न्यूक्लिएशन शायद शुक्र ग्रह के ऊपरी बादलों या धरती के बहुत ऊंचे वायुमंडल में हो सकता है, लेकिन वहां इसे साबित नहीं किया जा सका। मंगल पर इस प्रक्रिया के संकेत मिलने से वैज्ञानिकों को ग्रहों के वायुमंडल में बादल बनने की प्रक्रियाओं को नए नजरिए से देखने का मौका मिला है।

मंगल और धरती के बादल कुछ बुनियादी नियमों का पालन करते जरूर दिखते हैं, लेकिन अर्सिया मॉन्स के ऊपर बनने वाला यह विशाल बादल बताता है कि अलग-अलग ग्रहों पर मौसम की परिस्थितियां बिल्कुल अलग तरह की भौतिक प्रक्रियाओं को जन्म दे सकती हैं।

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