
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस वर्ष आषाढ़ अमावस्या 14 जुलाई को मनाई जाएगी। खास बात यह है कि इस बार अमावस्या मंगलवार को पड़ रही है, जिसके कारण इसे भौमवती अमावस्या भी कहा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह संयोग पितरों के तर्पण, दान-पुण्य, कालसर्प दोष निवारण और मंगल दोष की शांति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
आषाढ़ अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ अमावस्या तिथि 13 जुलाई की शाम 6 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ होकर 14 जुलाई की दोपहर 3 बजकर 14 मिनट तक रहेगी। इस दिन स्नान और दान का शुभ मुहूर्त प्रातः 4 बजकर 30 मिनट से सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक रहेगा।
ऐसे करें आषाढ़ अमावस्या का पूजन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन सूर्योदय से पहले किसी पवित्र नदी, सरोवर या गंगाजल मिले जल से स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। इसके पश्चात तांबे के पात्र में जल, गंगाजल, काले तिल, दूध और कुश मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण करें।
घर के मंदिर में दीपक प्रज्वलित करें। भौमवती अमावस्या होने के कारण इस दिन हनुमान जी और मंगल देव की विशेष पूजा का भी महत्व बताया गया है। हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करना शुभ माना जाता है।
पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार कर गाय के उपलों की अग्नि में घी, गुड़ और भोजन का भोग अर्पित करें। इसके बाद भोजन का कुछ भाग गाय, कौए, कुत्ते, चींटियों और ब्राह्मण के लिए निकालने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितर विभिन्न रूपों में आकर अन्न ग्रहण करते हैं।
अमावस्या पर किन वस्तुओं का करें दान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या तिथि पर किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है। इस दिन गेहूं, चावल, सत्तू, मौसमी फल, काले तिल, छाता, चप्पल और सूती वस्त्र जैसी वस्तुओं का दान शुभ माना गया है।
आषाढ़ अमावस्या का धार्मिक महत्व
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए आषाढ़ अमावस्या पर पिंडदान, तर्पण और अन्नदान करना विशेष फलदायी माना गया है। ऐसा करने से पितरों की कृपा प्राप्त होने और सुख-समृद्धि में वृद्धि होने की मान्यता है।
इसके अलावा अमावस्या के स्वामी शनि देव माने जाते हैं। इस दिन हनुमान जी की आराधना करने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव में कमी आने की मान्यता है। वहीं, मंगलवार के संयोग के कारण राहु, केतु और मंगल से जुड़े अशुभ प्रभावों की शांति के लिए भी यह दिन विशेष माना गया है।



