
रांची: तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को नई दिशा दे दी है। दोनों दलों में हुई बड़ी टूट का असर केवल संबंधित पार्टियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव लोकसभा और राज्यसभा में सत्ता पक्ष तथा विपक्षी गठबंधनों की ताकत पर भी दिखाई देने लगा है। इस बदलाव के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और इंडिया ब्लॉक के भीतर दलों की स्थिति में महत्वपूर्ण फेरबदल देखने को मिल रहा है।
हालांकि बागी सांसदों और उनके नए राजनीतिक ठिकानों को लेकर औपचारिक मान्यता की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन मौजूदा संख्या बल के आधार पर गठबंधन की आंतरिक तस्वीर बदलती नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में इसका असर संसद से लेकर केंद्र सरकार के राजनीतिक फैसलों तक दिखाई दे सकता है।
NDA में बदला सहयोगी दलों का शक्ति संतुलन
ताजा घटनाक्रम के बाद अब तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी मानी जाने वाली तेलुगुदेशम पार्टी तीसरे स्थान पर पहुंचती दिखाई दे रही है। वहीं पहले तीसरे नंबर पर रहने वाली जनता दल यूनाइटेड की स्थिति और कमजोर हुई है।
तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के नए राजनीतिक समूह में शामिल होने की घोषणा के बाद यह गुट संख्या बल के आधार पर गठबंधन के भीतर प्रमुख सहयोगियों में शामिल हो गया है। दूसरी ओर महाराष्ट्र में शिवसेना शिंदे गुट की संसदीय ताकत भी पहले से अधिक मजबूत हुई है।
INDIA ब्लॉक में घटा बड़े दलों का दायरा
विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के लिए यह घटनाक्रम बड़ा झटका माना जा रहा है। अब गठबंधन में दो अंकों में सांसद संख्या रखने वाले प्रमुख दलों में केवल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ही बची हैं।
कभी विपक्ष के सबसे मजबूत घटकों में शामिल तृणमूल कांग्रेस की संसदीय ताकत घटने से उसकी स्थिति कमजोर हुई है। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का प्रभाव अपेक्षाकृत बढ़ता दिखाई दे रहा है। शिवसेना यूबीटी भी सांसद संख्या में गिरावट के बाद विपक्षी खेमे में पीछे खिसक गई है।
महाराष्ट्र की राजनीति में शिंदे गुट को बड़ा फायदा
शिवसेना यूबीटी में हुई टूट का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को मिलता दिखाई दे रहा है। यदि बागी सांसदों के विलय को आधिकारिक मान्यता मिल जाती है, तो शिंदे गुट महाराष्ट्र में सबसे प्रभावशाली सहयोगी दलों में शामिल हो जाएगा।
नई स्थिति में शिंदे गुट की संसदीय ताकत कांग्रेस के बराबर पहुंच सकती है और राज्य की राजनीति में उसका प्रभाव पहले से कहीं अधिक मजबूत हो सकता है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार पर भी पड़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन बदलावों का असर केंद्र सरकार के संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में भी दिखाई दे सकता है। सहयोगी दलों की बढ़ी हुई संख्या और बदले हुए शक्ति संतुलन के आधार पर मंत्रिपदों के बंटवारे में नए समीकरण बन सकते हैं।
शिवसेना शिंदे गुट की संसदीय ताकत बढ़ने के बाद उसके मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बढ़ने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। वहीं नए राजनीतिक समूहों को लेकर भारतीय जनता पार्टी को संतुलन साधने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
राज्यसभा और लोकसभा में बदल सकती है रणनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार विपक्षी दलों में हुई टूट का असर संसद के दोनों सदनों में रणनीति और संख्या बल पर भी पड़ सकता है। खासकर महत्वपूर्ण विधेयकों और राजनीतिक मुद्दों पर गठबंधनों की ताकत का नया आकलन किया जाएगा।
आने वाले समय में इन घटनाक्रमों का असर राष्ट्रीय राजनीति, विपक्षी एकजुटता और केंद्र सरकार की रणनीति पर किस रूप में पड़ता है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।



