हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में 676 झीलों का विस्तार; 130 भारत में

नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने के साथ ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार ने आपदा के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वर्ष 2026 में सामने आए उपग्रह आधारित अध्ययन के मुताबिक उच्च हिमालयी एशिया में वर्ष 2016-17 के बाद ग्लेशियल झीलों के कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ऐसी ग्लेशियल झीलें मिली हैं, जिनके आकार में उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया गया है। इनमें 130 झीलें भारत में स्थित हैं।
भारत की 130 झीलों में लगातार बढ़ा आकार
अध्ययन के अनुसार भारत में विस्तार वाली 130 ग्लेशियल झीलों में 65 सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में स्थित हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक झीलों का बढ़ता आकार चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि कई ग्लेशियल झीलें बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे बनी होती हैं।
यदि ऐसे प्राकृतिक बांध टूटते हैं तो झील का पानी अचानक तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। इससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आने और बड़े पैमाने पर नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।
उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियल झीलें
उपग्रह आधारित नए अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में कुल 31,698 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। वर्ष 2016-17 की तुलना में इनके कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ग्लेशियल झीलों के विस्तार को खास तौर पर महत्वपूर्ण पाया गया है। इस क्षेत्र में झीलों का कुल क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।
ग्लेशियल झीलें सामान्य तौर पर ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने के कारण बनती हैं। इनमें से कई झीलों के किनारे बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांध होते हैं, जिनकी स्थिरता मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
इसरो के पुराने आंकड़ों में भी सामने आई थी चिंता
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित पुराने अध्ययन में भी भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते विस्तार की जानकारी सामने आई थी।
इसरो ने वर्ष 1984 से उपलब्ध उपग्रह आंकड़ों के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया था। इनमें 676 झीलों के आकार में वर्ष 1984 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
इन 676 झीलों में 130 झीलें भारत में स्थित थीं। अध्ययन के अनुसार 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो चुका था। झीलों के इस तरह बढ़ते आकार को हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और जलवायु में हो रहे बदलावों से जुड़े संभावित जोखिम के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों पर नजर
मानसून के दौरान इसरो हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार निगरानी कर रहा है। इसके तहत एनएचपीसी की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियल झीलों पर नजर रखी जा रही है।
उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के जरिए झीलों के आकार, जलस्तर और आसपास होने वाले भूगर्भीय बदलावों की निगरानी की जा सकती है। इससे संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
ग्लेशियल झीलों के साथ भूस्खलन भी बढ़ा सकता है खतरा
हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार के साथ भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा हुआ है। भारी बारिश, चट्टानों के खिसकने और पहाड़ी ढलानों में बदलाव के कारण झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसरो के उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार हिमालयी पर्वत श्रृंखला में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। ऐसे में ग्लेशियल झीलों का विस्तार, प्राकृतिक बांधों की अस्थिरता और भूस्खलन एक साथ मिलकर खतरे को और गंभीर बना सकते हैं।
निचले इलाकों और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी असर
ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार का खतरा केवल ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में अचानक आने वाली बाढ़ का असर निचले इलाकों में रहने वाली आबादी तक पहुंच सकता है। जलविद्युत परियोजनाएं और उनके आसपास का बुनियादी ढांचा भी इसकी चपेट में आ सकता है।
ऐसे में उपग्रहों के जरिए लगातार निगरानी, संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान, समय पर चेतावनी और आपदा प्रबंधन की मजबूत तैयारी हिमालयी क्षेत्र में नुकसान को कम करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।



