MP: पांढुर्णा के गोटमार मेले में पत्थरबाजी से 450 से ज्यादा घायल, 10 की हालत गंभीर; नागपुर भेजे गए मरीज

पांढुर्णा: मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में प्रसिद्ध गोटमार मेले के दौरान पारंपरिक पत्थरबाजी में 450 से ज्यादा लोग घायल हो गए। इनमें 10 लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है। पुलिस के मुताबिक, गंभीर रूप से घायल लोगों में से तीन को इलाज के लिए नागपुर रेफर किया गया है। वहीं, मेला देखने पहुंची पांच साल की बच्ची के सिर में गंभीर चोट लगी है। एक 11 वर्षीय बच्ची के भी घायल होने की जानकारी है।
पांढुर्णा के पुलिस अधीक्षक प्रकाश चंद्र परिहार ने शुक्रवार को बताया कि सदियों पुराने इस मेले का आयोजन जाम नदी के किनारे किया गया। मेले के दौरान पलाश के पेड़ को काटने और देवी चंडी को पारंपरिक झंडा भेंट करने के बाद आयोजन समाप्त हुआ।
घायलों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार गोटमार मेले में 450 लोग घायल हुए हैं। हालांकि स्थानीय सूत्रों का दावा है कि घायलों की संख्या करीब 650 तक हो सकती है। इसमें मामूली रूप से घायल लोग भी शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि घायलों की अंतिम संख्या तैयार की जा रही है।
700 पुलिसकर्मियों की तैनाती, ड्रोन से निगरानी
मेले को लेकर पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। पुलिस के मुताबिक मेला क्षेत्र और उसके आसपास 700 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। निगरानी के लिए 10 सीसीटीवी कैमरे और तीन ड्रोन लगाए गए थे। ड्रोन के जरिए जाम नदी के क्षेत्र और आसपास के इलाकों पर लगातार नजर रखी गई।
क्या है गोटमार मेले के पीछे की मान्यता?
गोटमार मेले की परंपरा एक पुरानी लोककथा से जुड़ी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार पांढुर्णा का एक युवक पास के सावरगांव की युवती से प्रेम करता था। युवक कथित तौर पर युवती को लेकर पांढुर्णा की ओर जा रहा था। दोनों जब जाम नदी के बीच पहुंचे तो सावरगांव के ग्रामीणों ने उन पर पत्थर बरसाए। पत्थर लगने से दोनों की मौत हो गई।
स्थानीय मान्यता है कि इसी घटना की याद में यह रस्म सदियों से निभाई जा रही है।
हर साल पत्थरबाजी में घायल होते हैं लोग
स्थानीय लोगों के मुताबिक गोटमार मेले के दौरान हर साल बड़ी संख्या में लोग घायल होते हैं। पिछले साल करीब 350 लोग घायल हुए थे। स्थानीय लोगों ने यह भी दावा किया है कि पिछले कुछ वर्षों में इस परंपरा के दौरान 17 लोगों की मौत हो चुकी है।
झंडे पर कब्जे के लिए बरसाए जाते हैं पत्थर
परंपरा के अनुसार जाम नदी के बीच एक झंडा लगाया जाता है। इस झंडे पर कब्जा करने के लिए दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इसी रस्म को निभाने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग नदी के किनारे पहुंचते हैं और परंपरा के नाम पर एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं।



