देहरादून: उत्तराखंड की ग्लेशियर झीले भले ही प्राकृतिक रूप से आपदा का कारण बने लेकिन उनके प्रभाव को प्रभावहीन करने के लिए धामी सरकार टैक्नोलॉजी ड्रिवेन डिजास्टर मैनेजमेंट पर काम कर रही है। आपदा की हर आहट पर निगाह रखने वाली राज्य सरकार की सोच का पता केवल इसी बात से लग जाता है कि उत्तराखंड की हाई रिस्क ग्लेशियल झीलों से GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) के खतरे को कम करने के लिए अब सिर्फ सर्वे नहीं, बल्कि जमीन पररियल टाइम मॉनिटरिंग शुरू हो गई है। चमोली की वसुधारा ताल में सेंसर औरअर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का काम किया जा रहा है। इस सिस्टम के जरिए पानी, बर्फ, मौसम, कंपन और जल प्रवाह में बदलाव की जानकारी सीधे कंट्रोल रूम तक पहुंचेगी।
सात दिन से वसुधारा में डटी टीम, सेंसर लगाने का चल रहा काम :

मुख्यमंत्री धामी के निर्देश पर नेपाल बाढ़ त्रासदी के मद्देनजर ग्लेशियर लेक मैनेजमेंट को प्राइम एजेंडे के तौर पर रखा गया है। इसीलिए उत्तराखंड में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के संभावित खतरे को देखते हुए चमोली की वसुधारा ताल में प्रदेश के पहले सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना का काम चल रहा है। 29 सितंबर से शुरू हुआ यह अभियान 15 अक्टूबर तक प्रस्तावित है। वैज्ञानिक और तकनीकी दल को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने रवाना किया था। अभियान में CBRI (Central Building Research Institute) रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों के साथ SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी सहयोग कर रहे हैं।
इस संबंध में आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन का कहना है कि मुख्य टीम को वसुधारा पहुंचे करीब सात दिन हो चुके हैं और टीम लगातार मौके पर काम कर रही है। फिलहाल झील के आसपास सेंसर लगाने के लिए जरूरी खुदाई शुरू कर दी गई है। सेंसरों के पोल लगाने और इसके बाद उपकरण स्थापित करने का काम अगले दो से तीन दिनों में पूरा करने का लक्ष्य है। इसके बाद सिस्टम का ट्रायल किया जाएगा और ट्रायल के परिणाम देखने के बाद टीम नीचे लौटेगी। आपदा प्रबंधन सचिव का कहना है कि टीम के कुछ सदस्य झील के ऊपर काम कर रहे हैं, जबकि कुछ सदस्य बेस कैंप में हैं। जरूरत के हिसाब से टीम के सदस्य ऊपर-नीचे आते-जाते रहेंगे, क्योंकि इतनी ऊंचाई और दुर्गम इलाके में लगातार एक ही जगह रहकर काम करना आसान नहीं है।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय संस्थान NRSC के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई है। इनमें से NDMA और तकनीकी संस्थाओं ने 13 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा है। इनमें इन 13 हाई रिस्क कैटेगरी झीलों में से 6 झील का बाथिमेट्रिक सर्वे किया गया है। बाथिमेट्रिक सर्वे (Bathymetric Survey) पानी के नीचे की सतह, गहराई और भूभाग (जैसे समुद्र तल, झील, नदी या बांध के नीचे की जमीन) की मैपिंग करने वाली एक हाइड्रोग्राफिक प्रक्रिया है।।
इन छह झीलों में चमोली की सरस्वती ताल और वसुधारा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल और पिथौरागढ़ की दारमा घाटी की मबांग (Mabang), प्यूनग्रू (Pyungru), स्युंक्ति यांक्ति (Syunkti Yankti) प्रो ग्लेशियल झीलें हैं। प्रो ग्लेशियल वो होती हैं, जो पिघलते हुए हिमनदों (Glaciers) या बर्फ की चादरों के सामने या उनके छोर पर बनती हैं।
वसुधारा ताल में लगाए जा रहे हैं ये 8 तरह के सेंसर :
इन उपकरणों का उद्देश्य सिर्फ यह पता लगाना नहीं है कि झील में पानी कितना है, बल्कि इनसे झील और उसके आसपास होने वाले अलग-अलग बदलावों को एक साथ समझने की कोशिश होगी। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, ये पूरा सिस्टम पानी के स्तर, मौसम, बर्फ, जल प्रवाह और आसपास की गतिविधियों में असामान्य बदलाव पकड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है.
8 तरह के सेंसर से मिलेगी रियल टाइम जानकारी :

लेक मैनेजमेंट सिस्टम में कुल आठ तरह के सेंसर लगाए जा रहे हैं। इन सेंसरों के जरिए झील के जलस्तर की जानकारी लगातार मिलती रहेगी। इसके साथ यह भी पता चलेगा कि झील के आसपास किसी तरह की टिल्टिंग यानी झुकाव हो रहा है या नहीं, कोई कंपन अथवा दूसरी असामान्य गतिविधि तो नहीं हो रही। सिस्टम से मिलने वाला डेटा रियल टाइम में उपलब्ध होगा। इसके लिए एक कंट्रोल रूम राज्य के पास रहेगा, जबकि दूसरा CBRI के पास रहेगा। दोनों जगह से डेटा की निगरानी की जा सकेगी और अगर कोई ऐसी स्थिति सामने आती है जिसे सामान्य नहीं माना जा सकता, तो उसके आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जा सकेगी।
फिलहाल सिस्टम को ट्रायल फेज में रखा गया है। अभी एक ही जगह सिस्टम लगाया जा रहा है और इसके परिणाम देखने के बाद ही बड़े स्तर पर इसे लागू करने का फैसला होगा। अगर वसुधारा में इसका परिणाम सकारात्मक रहता है तो इसे बाकी संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के आसपास भी लगाया जाएगा। इसके लिए CBRI से दूसरी जगहों पर भी सिस्टम लगाने को कहा जा सकता है। अगर वसुधारा में ट्रायल के परिणाम सकारात्मक रहते हैं तो इसी मॉडल को दूसरी संवेदनशील झीलों में भी दोहराया जाएगा. यानी अभी वसुधारा को एक तरह की टेस्ट साइट के रूप में देखा जा रहा है। सफल होने पर यही व्यवस्था उत्तराखंड की अन्य हाई रिस्क ग्लेशियल झीलों तक पहुंच सकती है।
क्यों जरूरी है GLOF झीलों की निगरानी :
GLOF की सबसे बड़ी चुनौती इसकी अचानक बदलने वाली प्रकृति है। अगर झील में पानी का स्तर बढ़ने के साथ ही आसपास की बर्फ या मलबे में असामान्य हलचल हो रही है। इसके अलावा पानी के बहाव में अचानक बदलाव आ रहा हो तो यह बहुत की खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए समय रहते इन संकेतों को पकड़ना महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी वजह से अब सिर्फ समय-समय पर जाकर झील देखने के बजाय सेंसर आधारित लगातार निगरानी की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

ग्लेशियल झीलों की निगरानी में सबसे महत्वपूर्ण बात केवल डेटा इकट्ठा करना नहीं है. असली चुनौती यह है कि अगर पानी का स्तर, बर्फ, जल प्रवाह या आसपास की जमीन में कोई असामान्य बदलाव होता है तो उसकी जानकारी कितनी जल्दी मिले और उसके आधार पर प्रभावित इलाकों के लिए समय रहते चेतावनी जारी की जा सके. इसी दिशा में वसुधारा का यह प्रयोग महत्वपूर्ण है। सरकार पहले झीलों का वैज्ञानिक सर्वे कर उनकी स्थिति और जोखिम समझ रही है और अब उसी जानकारी को लगातार मॉनिटरिंग से जोड़ रही है। राज्य में 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान और उनमें 13 को हाई रिस्क श्रेणी में रखे जाने के बाद वसुधारा में शुरू हुआ यह सिस्टम भविष्य में उत्तराखंड के ग्लेशियल झील मॉनिटरिंग नेटवर्क की नींव बन सकता है।



