SIR विवाद के बीच जस्टिस उज्जल भुइयां का बड़ा बयान, बोले- वोटिंग का अधिकार छीनना अनुच्छेद 14 और 326 का उल्लंघन होगा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने वोट देने के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक की नागरिकता और उसके वोट देने के अधिकार को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। किसी भारतीय नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित करना उसे अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती और संविधान से ऊपर कोई नहीं है।
एनएएलएसएआर में आयोजित राष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक भारतीय नागरिक के नजरिए से वोट देने का अधिकार और मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार अलग-अलग नहीं हैं। उन्होंने इसे शरीर से आत्मा निकालने जैसा बताया।
वोट के अधिकार से वंचित करना अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन
जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो वर्ग नहीं बनाता। एक वर्ग उन नागरिकों का नहीं हो सकता, जिन्हें वोट देने का अधिकार है और दूसरा उन नागरिकों का, जिनके पास यह अधिकार नहीं है।
उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके जरिए बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है, संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी।
उन्होंने कहा कि अगर कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को उनके ही देश में वोट देने के अधिकार से वंचित कर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बना देती है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी। उनके मुताबिक, इसे किसी भी तर्क के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस भुइयां ने इसे संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी स्थिति संविधान के मूल पर असर डालती है और भारतीय संविधान के तहत अपनाई गई संवैधानिक व्यवस्था को नकारने जैसी होगी।
उन्होंने कहा कि नागरिकता और मतदान का अधिकार आपस में जुड़े हुए हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, नागरिक के वोट देने के अधिकार में लिंग, नस्ल, धर्म, संपत्ति, शिक्षा या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेद नहीं किया जा सकता, सिवाय सीमित और उचित अपवादों के।
एमपी जैन का हवाला, स्वतंत्र चुनाव को बताया जरूरी
जस्टिस भुइयां ने एमपी जैन का हवाला देते हुए कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि विधायिका मतदान के अधिकार को सीमित करने के लिए तर्कहीन या अनुचित प्रावधान न बनाए।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा लोकतंत्र संविधान की बुनियादी विशेषताएं हैं। अगर यह सिद्धांत कानून के लिए लागू होता है, तो किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए भी उतना ही, बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
डॉ. आंबेडकर के भाषण का भी किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के समापन भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने चेतावनी दी थी कि वोट देने का अधिकार और भारतीय नागरिक का वयस्क मताधिकार संविधान में लिखा जाना चाहिए। इसे केवल संसदीय कानून के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ भारत के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। यह लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद हासिल हुई आजादी की अभिव्यक्ति है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कोई प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और कोई अदालत भी इसे सही नहीं ठहरा सकती। उन्होंने कहा कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है।
NALSAR के छात्रों की भी तारीफ
राष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में जस्टिस भुइयां ने NALSAR के छात्रों की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि छात्रों ने देश और दुनिया को दिखाया है कि विश्वविद्यालय के छात्र और खासकर कानून के छात्र कैसे होने चाहिए।
उन्होंने छात्रों को प्रतिभाशाली, निडर और साहसी बताया। वहीं, संकाय सदस्यों की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभाई हैं और वही किया है, जिसकी एक विश्वविद्यालय के शिक्षक से उम्मीद की जाती है।



