
मेवात: हरियाणा के नूंह स्थित मेवात में जमीयत उलमा-ए-हिंद की मजलिस-ए-मुन्तजिमा का अधिवेशन आयोजित किया गया। अधिवेशन के दूसरे दिन संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने संबोधित करते हुए देश के मौजूदा हालात, संविधान, लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े कई मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि देश में ऐसी परिस्थितियां बनाई जा रही हैं, जिनमें अल्पसंख्यकों, दलितों और मुसलमानों के संवैधानिक अधिकार निशाने पर हैं।
मदनी ने कहा कि देश इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। लोकतांत्रिक भावना और संविधान की मूल भावना को बदलने की कोशिशें हो रही हैं। उनके मुताबिक, देश में नफरत का माहौल बनाया जा रहा है, जिससे न केवल अल्पसंख्यकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि कानून का शासन और न्याय व्यवस्था भी कमजोर हो रही है।
1947 में दो राष्ट्र सिद्धांत को ठुकराने का किया जिक्र
मेवात की धरती से देशवासियों को संबोधित करते हुए मदनी ने कहा कि मुसलमानों का इस जमीन से गहरा रिश्ता है। उन्होंने कहा कि 1947 में देश के सामने आए गंभीर मोड़ पर उनके समुदाय ने दो राष्ट्र सिद्धांत को ठुकराया था और इस धरती को अपने खून-पसीने से सींचा है।
उन्होंने कहा कि इस मिट्टी में दफन उनके बुजुर्गों की कब्रें इस बात की गवाह हैं कि देश को आजादी दिलाने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ न्योछावर किया। मदनी ने आरोप लगाया कि कुछ लोग मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा करने वाले लोग संविधान, लोकतंत्र और देश की आजादी के मूल्यों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं।
‘मुसलमान इस देश के किरायेदार नहीं, हिस्सेदार हैं’
मदनी ने कहा कि आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश किस तरह के वैचारिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है। उन्होंने अल्पसंख्यकों, दलितों और मुसलमानों के साथ हो रहे व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुसलमानों के लिए हालात मुश्किल बनाने और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिशें की जा रही हैं।
उन्होंने कहा, “हम इस मुल्क के किरायेदार नहीं बल्कि हिस्सेदार हैं। हम किसी राजनीतिक पार्टी के एहसान की वजह से यहां नहीं हैं, बल्कि हमारे बुजुर्गों ने इस देश के लिए कुर्बानी दी है। यह देश हमारा है।” मदनी ने यह सवाल भी उठाया कि क्या देश में मुसलमान होना अपराध बन गया है।
बुलडोजर की कार्रवाई और बहुसंख्यकों के खतरे पर उठाए सवाल
मदनी ने कहा कि देश का बंटवारा पहले ही हो चुका है, लेकिन कुछ लोग अब बुलडोजर को ही इंसाफ मानने लगे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बुलडोजर की कार्रवाई केवल घरों को नहीं गिराती, बल्कि न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करती है।
उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समाज के सामने झूठे खतरे की तस्वीर पेश की जा रही है और दावा किया जा रहा है कि करीब 100 करोड़ की आबादी खतरे में है। मदनी ने आरोप लगाया कि सरकारें वोटों की राजनीति के लिए इस तरह के मुद्दों को हवा दे रही हैं।
नफरती बयानों के 1600 से ज्यादा मामले सामने आने का दावा
मदनी ने कहा कि पहले लगता था कि नफरत भरे बयान केवल चुनाव के समय वोट हासिल करने का तरीका हैं, लेकिन अब हालात इससे आगे बढ़ चुके हैं। उनके मुताबिक, देश को धीरे-धीरे ऐसी स्थिति की ओर धकेला जा रहा है, जहां धार्मिक भेदभाव संघर्ष की वजह बन सकता है।
उन्होंने दावा किया कि पिछले एक साल में देशभर में नफरत भरे बयानों की 1600 से अधिक सत्यापित घटनाएं सामने आई हैं। मदनी के अनुसार, इनमें से 87 प्रतिशत मामलों में पुलिस ने कार्रवाई करना तो दूर, प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की।



