दस्तक-विशेष

गाँवों से निकला खुशहाली का रास्ता

नानाजी देशमुख की ग्रामोदय अवधारणा
सरिता अरगरे
अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य से समृद्ध मंदाकिनी के तट पर बसा चित्रकूट वो पावन स्थल है, जहाँ भगवान श्रीराम ने मान्यता अनुसार करीब साढ़े ग्यारह साल बिताये थे। लेकिन मौजूदा दौर में यह स्थान ग्रामोदय की अनूठी अवधारणा को मूर्तरूप देने वाले नानाजी देशमुख की कर्मस्थली के रूप में पहचान बना चुका है। तीर्थस्थली चित्रकूट का अधिकांश भाग मध्य प्रदेश के सतना जिले में आता है। वर्ष 2017 एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख सरीखे महान विचारकों के जन्मशती वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है। इसी सिलसिले में हाल ही में यहाँ ग्रामोदय मेले का आयोजन किया गया, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आये हजारों लोगों को नानाजी देशमुख के ग्राम विकास के अनूठे मॉडल को जानने-समझने का मौका मिला। उन्होंने चित्रकूट की पचास किलोमीटर के दायरे के करीब सवा पाँच सौ गाँवों को स्वावलम्बन का ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसने उनके जीवन के हर पहलू में खुशहाली के रंग भर दिये। नानाजी ने शिक्षित दम्पतियों को ग्रामीणों के बीच रह कर उनके सुख-दुख साझा करने, हर छोटी-बड़ी समस्या को स्थानीय स्तर पर सुलझाने, आपसी झगड़ों को मिल-बैठ कर निपटाने की जो सुलझी सोच सामने रखी, उसके सकारात्मक और सुखद परिणामों ने उनके व्यक्तित्व को विराट बना दिया। बरसों पहले कहीं दूर से आकर चित्रकूट के ग्रामीण परिवेश में रच-बस चुके ये शिक्षित जोड़े अब यहीं के होकर रह गये हैं। नानाजी का स्पष्ट मत रहा कि गाँवों का विकास करना है तो शहरों की चमक-दमक का मोह त्याग कर गाँवों की धूल भरी पगडंडियों पर चलना होगा, वहीं रह कर देहाती जीवन की जीवन शैली और संस्कृति को समझना होगा। उनकी जरूरतों को समझ कर भविष्य की योजनाएँ बनाना होंगी।
चित्रकूट भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक जगत आदिस्थल है। धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक चेतना जागृत करने वाला यह स्थान अद्भुत और नयनाभिराम स्थलों से परिपूर्ण है। महानगरों की चकाचौंध और भागमभाग के अभ्यस्त लोगों को यह कस्बा कुछ पल के लिये भले ही अलसाया सा उनींदा सा लगे लेकिन जल्दी ही यहाँ की धूल-मिट्टी उन्हें अपनी ओर खींचती सी महसूस होती है। हो भी क्यों नहीं, जब पूरा देश विकास के नाम महानगर और स्मार्ट सिटी चकाचौंध में डूब-उतरा रहा हो, तब दूर वनांचल में ग्रामीण परिवेश की जीवन शैली में जीवन के वास्तविक आनंद से लोगों को रूबरू होने का मौका मिल रहा है। चित्रकूट के आसपास के क्षेत्रों में स्वावलम्बन का पाठ पढ़ा कर युवाओं को बेरोजगारी के दंश से मुक्ति दिलाई जा रही है।
जीवन के चुनौतीपूर्ण अनुभवों के साथ नानाजी देशमुख ’चित्रकूट प्रकल्प दीनदयाल शोध संस्थान’ के माध्यम से आपने ध्येय को साधने की ओर बढ़ चले। वे मानते थे कि समाज के परस्पर अवलम्बन की भावना से ही ग्रामोदय संभव हो सकेगा। “हम अपने लिये नहीं, अपनों के लिये हैं- अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित एवं उपेक्षित हैं।” यह कथन युगदृष्टा नानाजी देशमुख का है। वे कहते थे कि नई पीढ़ी में सामाजिक दायित्वों का बीजारोपण करना परिवार का नैसर्गिक कत्र्तव्य है। वर्ष 1991 में स्वामी भगवानन्दजी महाराज के आग्रह पर वे चित्रकूट आ गये। देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना की और नाम रखा चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय। वर्ष 1991 से 1994 तक नानाजी ग्रामोदय विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलाधिपति रहे। सरकार की नीतियों से तंग आकर 1995 में उन्होंने खुद को संस्थान से अलग कर लिया और विश्वविद्यालय का काम सरकार के हाथों में चला गया। ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिये नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पतियों से पाँच वर्ष का समय समाज को देने का आव्हान किया। पति-पत्नी कम से कम स्नातक हों, आयु पैंतीस वर्ष से कम हो और दो से अधिक संतान न हों। इस आव्हान पर दूर-दूर के राज्यों से हर साल दम्पति बड़ी संख्या में चित्रकूट पहुँचने लगे। चुने गये दम्पतियों को पन्द्रह-बीस दिन का औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता और साथ ही नानाजी का विशिष्ट मार्गदर्शन उन्हें मिलता था। वे कहते- “राजा जनक की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में जब ग्यारह वर्ष
तक रह सकती है, तो आज भांति-भांति के संसाधनों के सहारे तुम पाँच वर्ष यहाँ क्यों नहीं गुजार सकतीं?” नानाजी के ये शब्द सुन कर नवदाम्पत्य में बँधी युवतियों में सेवाभाव और गहरा हो उठता। वे अपने कदम जगमगाते शहर और सुंदर मकानों की तरफ़ नहीं बल्कि सीता की तरह अपने पति के साथ जंगलों-पहाड़ों के बीच बसे गाँवों की ओर बढ़ा देतीं। और इनको नाम दिया गया- समाज शिल्पी दम्पति। सामाजिक पुनर्रचना की दृष्टि से दीनदयाल शोध संस्थान ने चित्रकूट के आसपास के अति पिछड़े गाँवों को चुना, जहाँ सड़क-बिजली तो दूर शिक्षा और चिकित्सा सुविधा का भी सर्वथा अभाव था। संस्थान ने अपने स्वावलम्बन लक्ष्य के लिये पाँच सूत्र तय किये- 1. कोई बेकार ना रहे 2. कोई गरीब ना रहे 3. कोई बीमार ना रहे 4. कोई अशिक्षित ना रहे 5. गाँव हरा-भरा और विवादमुक्त हो। ग्राम विकास की इस नवरचना का आधार वो समाज शिल्पी दम्पति थे, जो पाँच वर्ष तक गाँवों में रह कर लक्ष्य प्राप्ति के लिये दिन-रात मेहनत से जुटे रहते।
स्वावलम्बन के इसी विचार को लेकर चित्रकूट के अर्जुनपुर गाँव में विद्यालय खोला गया। गाँव वाले ही इसका संचालन करते हैं। विद्यालय ने पहले आसपास के करीब बीस गाँवों में पढ़ाई का वातावरण तैयार किया। गाँव वाले नहीं समझ रहे थे कि ये युवा जोड़े हमारे गाँव में अक्सर क्यों आते हैं। धीरे-धीरे कुछ ही महीनों में ग्रामीणों का व्यवहार बदलने लगा और उन्होंने अपनेपन से इन जोड़ों का साथ देना शुरू कर दिया। समाज शिल्पी दम्पति उनके सुख-दुख के साथी बन पारिवारिक सदस्य हो गये। यहीं से गाँवों की विकास यात्रा शुरू हो गई। जातियों में बँटे लोगों को रचनात्मक कार्यों से जोड़ने का काम इस युवा जोड़ों ने कर दिखाया। गाँवों का हिस्सा बन जनजागृति लाने वाले ये जोड़े बताते हैं कि खेती और पशु गाँव की रीढ़ हैं, जिनके सहारे आत्मनिर्भरता सुनिश्चित है। खेती को बर्बादी का कारण मान बैठे लोगों में नानाजी की ग्राम स्वावलम्बन अवधारणा नई उम्मीद जगा सकती है। खाद-बीज के मामले में आत्मनिर्भर बन चुके इन गाँवों में हरियाली और खुशहाली चारों ओर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। जैविक खेती और परम्परागत खेती के अलावा कुटीर उद्योगों ने भी स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा कर पलायन रोकने में मदद की है। पशुधन के कारण आर्थिक समृद्दि बढ़ी है, तो पर्यावरण संतुलन भी मजबूत हुआ है।
ग्राम विकास की अद्भुत संकल्पना से प्रेरित दम्पति नानाजी के सपनों को वहाँ साकार कर रहे हैं। समाज शिल्पियों का शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन और सामाजिक समरसता प्रकल्प चलाने में सराहनीय योगदान है। शहर के उपभोगवादी जीवन को छोड़ ग्राम्य जीवन की सादगी अपनाने वाले आज भले ही उम्र के चौथे-पाँचवें पहुँच गये हैं लेकिन उनके चेहरे की चमक संतुष्टि और आत्मिक आनंद का दर्पण बन गई है। चित्रकूट परियोजना छिन्न-भिन्न हो चुके सामाजिक ताने-बाने को एक बार फ़िर से करीने से सजाने का सफ़ल प्रयोग है। इस प्रयोग की कामयाबी यह भी बताती है कि ईमानदार प्रयासों के लिये चुनौतियाँ खुद ही नई राहें बनाती हैं।

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