राम कुमार सिंह
स्तंभ: उत्तराखंड की भौगोलिक बनावट जितनी जटिल है, उसकी राजनीतिक अपेक्षाएँ भी उतनी ही संवेदनशील हैं। पहाड़ का जनमानस केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होता,वह नेतृत्व को अपने बीच देखना चाहता है। ऐसे परिदृश्य में पुष्कर सिंह धामी के लगातार जिलावार दौरों ने राज्य की राजनीति में एक नई संवाद संस्कृति को जन्म दिया है।

सत्ता से सड़क तक का सफ़र
उत्तराखंड में लंबे समय तक शासन का केंद्र देहरादून की सचिवालयी सीमाओं में सिमटा हुआ माना जाता रहा। योजनाएँ बनती थीं, घोषणाएँ होती थीं, लेकिन दूरस्थ सीमांत गांवों तक उनका प्रत्यक्ष असर देर से पहुँचता था। धामी ने इस प्रवृत्ति को बदल दिया।उनके लगातार दौरों ने चाहे वह पिथौरागढ़,धारचूला या मिलन की सीमांत बस्तियाँ हों, चमोली के आपदाग्रस्त क्षेत्र हों या नीति माणा का प्रथम गॉव या फिर हरिद्वार का औद्योगिक परिक्षेत्र। धामी ने प्रशासनिक मशीनरी को मैदान में उतरने के लिए बाध्य किया और यह सुनिश्चित किया की जनता की सरकार को जनता के द्वार तक पहुँचना ही होगा।

धामी का जन संवाद, सिर्फ भाषण नहीं
धामी के दौरों की विशेषता केवल मंचीय सभाएँ नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों, महिला समूहों और युवाओं से सीधा संवाद है। “जनता दरबार” और मौके पर समीक्षा बैठकों की परंपरा ने एक संदेश दिया कि शासन सुनने के लिए भी तत्पर है। यह शैली पूर्व के नेतृत्व से भिन्न दिखाई देती है। उदाहरण के लिए नारायण दत्त तिवारी का कार्यकाल औद्योगिक आधार मजबूत करने के लिए याद किया जाता है, जबकि भुवन चन्द्र खंडूरी प्रशासनिक अनुशासन और सख्ती के लिए चर्चित रहे। धामी ने इन परंपराओं के बीच सुशासनके साथ-साथ “सक्रिय उपस्थिति” को अपनी पहचान बनाया है।

कुमाऊँ से उठकर, गढ़वाल तक समान उपस्थिति
कुमाऊँ क्षेत्र से आने के बावजूद धामी ने गढ़वाल मंडल में भी व्यापक कार्यक्रम कर राजनीतिक संतुलन का संकेत दिया। चारधाम यात्रा मार्गों की समीक्षा, केदारनाथ और बदरीनाथ क्षेत्र में विकास कार्यों का निरीक्षण, और सीमांत गांवों में रात्रि प्रवास,इन पहलों ने क्षेत्रीय असंतुलन की धारणा को कमजोर किया है।

संकट में अग्रिम पंक्ति में खड़े होने की शैली ने जीता उत्तराखंड की जनता का दिल
आपदा प्रबंधन उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। बाढ़, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के समय धामी की त्वरित स्थलीय उपस्थिति ने प्रशासनिक तत्परता को बल दिया। पहले जहां सूचनाएँ राजधानी तक पहुँचने और निर्णय आने में समय लेती थीं, वहीं अब घटनास्थल से ही समीक्षा और निर्देश देने की प्रवृत्ति ने उत्तराखंड की नई कार्यशैली को जन्म दिया है।

आंकड़ों में बदल दी तस्वीर
राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में पर्यटकों की संख्या सीमित था,हाल के वर्षों में चारधाम यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु पहुँचे।
सड़क और कनेक्टिविटी परियोजनाओं में तीव्रता आई है, जिससे सीमांत क्षेत्रों का आवागमन बेहतर हुआ है
निवेश सम्मेलनों के माध्यम से राज्य को औद्योगिक नक्शे पर पुनः सक्रिय करने में सफलता मिली है।
धामी के सक्रिय संवाद और नियमित फील्ड विज़िट ने विकास को राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय विषय बना दिया है।

नई राजनीतिक संस्कृति की ओर
धामी की शैली में युवा ऊर्जा, आक्रामक संवाद और त्वरित निर्णय का मिश्रण है। वे केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि उनकी प्रगति का सार्वजनिक आकलन भी करते हैं। धामी की इस शैली से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों दोनों पर जवाबदेही का नया दबाव बना हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में संवाद की यह नई संस्कृति। जहाँ मुख्यमंत्री स्वयं पहाड़ की पगडंडियों तक पहुँचते हैं। सिर्फ प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। यदि यह प्रवृत्ति निरंतर बनी रहती है और जमीनी परिणामों में परिवर्तित होती है, तो कहा जा सकता है कि पुष्कर के दौरों ने सचमुच राज्य की राजनीति में एक नई कार्यशैली और संवाद परंपरा को स्थापित किया है। जहाँ सत्ता जनता से दूर रहकर नहीं, बल्कि जनता के दरवाज़े पर दस्तक देती है।
(लेखक दस्तक टाइम्स से संपादक हैं)




