10 मिनट में कामवाली, 100 रुपये घंटा: क्या इंस्टेंट हाउस-हेल्प का ये नया मॉडल टिकाऊ है?

नई दिल्ली: शनिवार की सुबह, नोएडा की एक हाई-राइज सोसायटी में रहने वाली 43 वर्षीय शिवानी माथुर अपने दिन की तैयारियों में जुटी थीं कि तभी उनके फोन पर व्हाट्सऐप नोटिफिकेशन आया—“दीदी, आज मैं नहीं आऊंगी।” यह संदेश उनके लिए नया नहीं था, लेकिन इस बार घर में मेहमान आने वाले थे और वक्त बेहद कम था।
घबराहट में उन्होंने सोसायटी ग्रुप पर मदद मांगी—“क्या किसी की हाउस हेल्प आज आ सकती है?” जवाब मिला—Urban Clap के इंस्टाहेल्प को ट्राय करिए, 10–15 मिनट में कोई आ जाएगा।
कुछ ही देर में बैंगनी यूनिफॉर्म पहने एक वर्कर उनके दरवाजे पर मौजूद थी। उसने घर की सफाई की, बर्तन धोए, किचन में हाथ बंटाया—आटा गूंथा, सब्जियां काटीं और चटनी के लिए पुदीना–धनिया तैयार किया। करीब दो घंटे में काम पूरा और खर्च 200 रुपये से भी कम। तब से यह सर्विस शिवानी के लिए फिक्स्ड बैकअप बन चुकी है।
शहरों में तेजी से बदलता ट्रेंड
शिवानी अकेली नहीं हैं। अर्बन इंडिया में तेजी से लोग इंस्टेंट हाउस-हेल्प की ओर बढ़ रहे हैं। जहां पहले पड़ोसियों और जान-पहचान के जरिए मदद ढूंढी जाती थी, अब ऐप खोलते ही 10 मिनट में मदद दरवाजे पर उपलब्ध है।
जिस तरह ओला–उबर ने ट्रैवल की परिभाषा बदली, स्विगी–जोमैटो ने फूड डिलीवरी और ब्लिंकिट–बिगबास्केट ने ग्रॉसरी शॉपिंग को ऑन-डिमांड बनाया, उसी तर्ज पर अब Snabbit, Pronto, Urban Company का इंस्टाहेल्प और Broomies घर के कामों के लिए मैदान में हैं।
आंकड़े इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं। स्नैबिट ने अगस्त में 1 लाख ऑर्डर से शुरुआत कर अक्टूबर तक 3 लाख और फरवरी तक लगभग 8.5 लाख ऑर्डर पूरे कर लिए। वहीं अर्बन कंपनी का इंस्टाहेल्प फरवरी 2026 में 50,000 डेली बुकिंग के स्तर तक पहुंच चुका है।
100 रुपये में एक घंटा, कैसे मुमकिन?
अर्बन कंपनी पर एक घंटे की सर्विस 100 रुपये में उपलब्ध है। स्नैबिट तीन एक-घंटे वाली विजिट का पैक 149 रुपये में देता है, यानी करीब 50 रुपये प्रति घंटा। यह मॉडल वर्कर्स के बड़े नेटवर्क पर आधारित है। बैकग्राउंड वेरिफिकेशन और ट्रेनिंग के बाद वर्कर्स ऐप के जरिए जॉब रिक्वेस्ट स्वीकार करते हैं, बिल्कुल कैब एग्रीगेटर मॉडल की तरह।
वर्कर्स के लिए सैलरी और सम्मान में बदलाव
इस मॉडल का बड़ा असर महिला वर्कर्स पर दिख रहा है। नोएडा सेक्टर 121 में काम करने वाली सुनीता बताती हैं कि उन्हें Urban Company से 30,000 रुपये मिलते हैं। 8 घंटे पूरे करने होते हैं, लेकिन लगातार करना जरूरी नहीं। अब सुबह 6 बजे से भागदौड़ नहीं करनी पड़ती। बच्चों को स्कूल भेजकर 8 बजे के स्लॉट के बाद काम शुरू कर सकती हैं।
कम डिमांड वाले इलाकों में भी फिक्स्ड सैलरी सुरक्षित रहती है। दो घंटे वाले मॉडल में 10,000 रुपये फिक्स के साथ बोनस का प्रावधान है। इसके अलावा SOS फीचर, शिकायत दर्ज कराने की सुविधा और हेल्थ इंश्योरेंस भी दिया जाता है। कई महिलाएं कहती हैं कि यूनिफॉर्म पहनने से उन्हें पेशेवर पहचान और सम्मान का एहसास होता है।
इतनी सस्ती सेवा, फिर भी भारी घाटा
सवाल उठता है कि इतनी कम कीमत पर यह मॉडल कैसे चल रहा है? दरअसल कंपनियां फिलहाल मुनाफे से ज्यादा स्केल पर फोकस कर रही हैं। अर्बन कंपनी के इंस्टाहेल्प ने Q3 FY 2026 में 61 करोड़ रुपये का EBITDA लॉस दर्ज किया है।
स्नैबिट और प्रोंटो भारी वेंचर कैपिटल फंडिंग के सहारे आगे बढ़ रहे हैं। स्नैबिट को 56 मिलियन डॉलर और प्रोंटो को 13 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिल चुकी है।
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सेक्टर वही राह पकड़ सकता है जो कैब और फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स ने अपनाई थी—शुरुआत में ज्यादा इंसेंटिव, बाद में कटौती। ऐसे में वर्कर्स की मौजूदा कमाई घट सकती है और ग्राहकों के लिए कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है। फिलहाल अर्बन कंपनी 60 फीसदी डिस्काउंट के बाद 99 रुपये में सर्विस दे रही है, लेकिन आगे दाम बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या ग्राहक बढ़ी कीमतें स्वीकार करेंगे?
यही इस मॉडल की असली परीक्षा होगी। संभव है कि ‘बहुत सस्ता, बहुत अच्छा’ वाला दौर सीमित समय तक रहे। लेकिन एक बात साफ है—कंज्यूमर बिहेवियर तेजी से बदल चुका है। ऐप-आधारित सुविधाओं की आदत लोगों को पड़ चुकी है। ऐसे में भविष्य में ज्यादा कीमत चुकाकर भी यह सुविधा छोड़ना आसान नहीं होगा।
भारत का इंस्टेंट हाउस-हेल्प सेक्टर फिलहाल एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है—तेज, आसान और धीरे-धीरे हर शहरी घर की जरूरत बनता हुआ।



