कल्याण से विश्वास तक: उत्तराखंड सरकार की सामाजिक राजनीति का नया रास्ता
उत्तराखंड सरकार ने अपने इस कार्यकाल में महिलाएं, युवा और सैनिक परिवारों पर खास फोकस किया। राजनीतिक दलों के लिए ये पक्का वोट बैंक रहा है। धामी ने पहली बार इन समूहों को वोट बैंक के दायरे से निकालकर विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश की है। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए लखपति दीदी योजना गेम चेंजर साबित हो रही है। देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार गोपाल पोखरिया की रिपोर्ट।
उत्तराखंड की राजनीति हमेशा से भावनाओं और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पहाड़ बनाम मैदान, पलायन, संसाधनों की कमी और केंद्र-राज्य संबंध जैसे मुद्दे समय-समय पर सत्ता विमर्श को दिशा देते रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में राज्य सरकार की सामाजिक नीतियों में जो बदलाव दिखता है,वह यह संकेत देता है कि सत्ता अब केवल मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय समाज के कुछ खास वर्गों के साथ दीर्घकालिक राजनीतिक संबंध बनाने की कोशिश कर रही है। महिलाएं, युवा और सैनिक परिवार तीनों वर्ग अब नीतियों के केंद्र में हैं और यही बदलाव भविष्य की राजनीति की जमीन तैयार करता दिखाई देता है।
महिलाओं को लेकर उत्तराखंड में लंबे समय तक कल्याणकारी सोच हावी रही। योजनाएं बनीं, सहायता मिली, लेकिन राजनीतिक हिस्सेदारी की बात अक्सर प्रतीकात्मक रही। स्वयं सहायता समूहों, महिला उद्यमिता और आर्थिक आत्मनिर्भरता को जिस तरह हाल के वर्षों में संगठित रूप दिया गया है, उसने महिलाओं की भूमिका को लाभार्थी से आगे बढ़ाकर भागीदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। ‘लखपति दीदी’ जैसी पहल केवल आय बढ़ाने का मॉडल नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में नेतृत्व और निर्णय क्षमता को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास भी है। राजनीतिक दृष्टि से यह बदलाव खास मायने रखता है। आर्थिक रूप से सशक्त होती महिलाएं अब केवल योजनाओं की प्राप्तकर्ता नहीं रहीं, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर सवाल करने लगी हैं। यह वर्ग आने वाले समय में सामाजिक और राजनीतिक संवाद को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। सरकार की नीतियां इस उभरती चेतना को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती दिख रही हैं, जिससे समर्थन केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अनुभव आधारित बन सके।

युवाओं के लिए संभावनाएं
युवाओं का प्रश्न उत्तराखंड की राजनीति के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रहा है। एक दौर में भर्ती प्रक्रियाओं में अव्यवस्था और पारदर्शिता की कमी ने युवाओं को सत्ता से दूर कर दिया था। नकल विरोधी कानून और परीक्षा प्रणाली में सुधार को प्रशासनिक कदम से आगे बढ़कर राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है। यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि व्यवस्था सुधर रही है और मेहनत करने वाले युवाओं के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके समानांतर स्टार्टअप, स्वरोजगार और कौशल विकास पर जोर यह संकेत देता है कि राज्य अब केवल सरकारी नौकरी-केंद्रित अपेक्षाओं से बाहर निकलने का नैरेटिव गढ़ रहा है। सीमित संसाधनों वाले राज्य में यह सोच राजनीतिक रूप से भी व्यावहारिक है। स्थानीय स्तर पर अवसरों की बात करना, पलायन जैसे भावनात्मक मुद्दे पर सत्ता को नैरेटिव बढ़त देता है और युवाओं के असंतोष को संभावनाओं की ओर मोड़ने का प्रयास भी करता है।
सैनिक परिवारों का सम्मान
सैनिक परिवारों का विषय उत्तराखंड में हमेशा सम्मान और संवेदना से जुड़ा रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इस वर्ग के लिए योजनाओं और प्रावधानों को अधिक स्पष्ट रूप से सामने लाना यह दर्शाता है कि भावनात्मक सम्मान को अब नीतिगत समर्थन से जोड़ा जा रहा है। पूर्व सैनिकों और शहीद परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पुनर्वास और सुविधाओं की बात करना केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है। खास बात यह है कि सैनिक परिवारों की बड़ी आबादी उन क्षेत्रों में रहती है, जहां विकास और सुविधाओं का सवाल लंबे समय से राजनीतिक असंतोष का कारण रहा है। इन परिवारों को नीति के केंद्र में रखकर सरकार न केवल भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करती है, बल्कि उन इलाकों में भरोसे का आधार भी तैयार करती है, जो अक्सर खुद को मुख्यधारा से दूर महसूस करते रहे हैं।

इन तीनों वर्गों को एक साथ देखें तो राज्य सरकार की सामाजिक नीतियों के पीछे एक साझा राजनीतिक रणनीति उभरती है। विश्वास आधारित समर्थन। यह समर्थन किसी एक घोषणा या तात्कालिक फैसले पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में दिखने वाले बदलाव पर टिका हुआ है। महिलाएं अगर आर्थिक रूप से मजबूत होती हैं, युवा अगर व्यवस्था में भविष्य देखते हैं और सैनिक परिवार अगर स्वयं को सम्मानित और सुरक्षित महसूस करते हैं, तो यह सत्ता के लिए एक स्थायी सामाजिक आधार तैयार करता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि नीतियों की असली परीक्षा उनके क्रियान्वयन में ही होगी। प्रशासनिक चुनौतियां किसी भी सरकार की क्षमता को परखती हैं। यदि यह सामाजिक एजेंडा केवल फाइलों तक सीमित रहा, तो अपेक्षाओं का दबाव बढ़ सकता है। लेकिन यदि जमीनी असर लगातार दिखता रहा, तो यही नीतियां आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श की दिशा तय कर सकती हैं। फिलहाल, उत्तराखंड की राजनीति में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव नजर आता है। विकास की परिभाषा अब केवल भौतिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन और सहभागिता की ओर बढ़ रही है। महिलाएं, युवा और सैनिक परिवार अब केवल सामाजिक समूह नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीतिक प्राथमिकता बनते दिख रहे हैं, और यही संकेत देता है कि राज्य की राजनीति धीरे-धीरे भविष्य की तैयारी में जुट चुकी है।
अगले दो साल में 5 लाख लखपति दीदियां
उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए लखपति दीदी योजना गेम चेंजर साबित हो रही है। राज्य में अभी तक ढाई लाख से अधिक महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं, अर्थात उन्हें सालाना एक लाख रुपये से अधिक की आमदनी हो रही है। अब सरकार ने अगले दो साल में इन समूहों से जुड़ी पांच लाख से अधिक महिलाओं की सालाना आय एक लाख से पार पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इस सिलसिले में सरकार की ओर से ग्राम्य विकास विभाग के अधिकारियों को निर्देश भी जारी किए गए हैं। राज्य के गठन और फिर उसके विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे देखते हुए सरकार ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के दृष्टिगत ग्राम्य विकास विभाग के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों के गठन की दिशा में कदम बढ़ाए। वर्तमान में केंद्र एवं राज्य सरकार के आजीविका मिशन के तहत 68 हजार से अधिक महिला स्वयं सहायता समूह गठित हो चुके हैं। ये समूह स्थानीय संसाधनों पर आधारित विभिन्न उत्पाद तैयार कर रहे हैं।

समूहों से जुड़ी महिलाओं के सशक्तीकरण के दृष्टिगत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशें के क्रम में लखपति दीदी योजना की शुरुआत की गई। इसके तहत महिलाओं को कृषि-उद्यान, स्थानीय उत्पाद, सिलाई-कढ़ाई के साथ ही रसोई गैस वितरण, प्रारंभिक पशु चिकित्सा सेवा, बीमा योजना, डिजिटल लेनदेन का प्रशिक्षण देकर आजीविका से जोड़ा जा रहा है। साथ ही समूहों के उत्पादों की बिक्री के लिए बाजार की उपलब्धता पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसके सार्थक परिणाम आए हैं। योजना की शुरुआत से लेकर दिसंबर 2025 तक राज्य में 2.54 लाख महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। उन्हें सालाना एक लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त हो रही है। चालू वित्तीय वर्ष में 1.20 लाख के लक्ष्य के सापेक्ष 91,445 महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। महिला समूहों की आजीविका को बढ़ाने के लिए अगस्त, 2023 से मुख्यमंत्री सशक्त बहना उत्सव योजना भी लागू की गई। वर्तमान में 35 हजार से ज्यादा महिलाएं इसका लाभ उठा रही हैं। योजना के तहत अब तक 9.11 करोड़ का कारोबार महिला समूह कर चुके हैं।




