
नई दिल्ली: सनातन परंपरा में समय को केवल दिनों और महीनों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। इसी धार्मिक व्यवस्था के तहत आने वाला अधिक मास इस वर्ष 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। इसे अधिक ज्येष्ठ मास और पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पूरा महीना पूजा-पाठ, साधना और दान-पुण्य के लिए बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन विवाह समेत कई मांगलिक कार्य इस अवधि में नहीं किए जाते। यही कारण है कि अधिक मास शुरू होते ही शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है।
क्यों रुक जाते हैं विवाह और शुभ संस्कार?
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अधिक मास के दौरान विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, नामकरण और मुंडन जैसे मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। माना जाता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते।
इसी वजह से ज्योतिष और धर्माचार्य इस अवधि में नए कार्यों की शुरुआत, बड़े निवेश और शुभ आयोजनों से बचने की सलाह देते हैं। हालांकि पूजा-पाठ, व्रत, दान और आध्यात्मिक साधना को इस दौरान अत्यंत फलदायी माना गया है।
क्या है अधिक मास का वैज्ञानिक आधार?
अधिक मास का संबंध हिंदू पंचांग की खगोलीय गणना से जुड़ा हुआ है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का माना जाता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर पैदा होता है।
यही अंतर लगभग तीन वर्षों में बढ़कर करीब 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इस असंतुलन को संतुलित करने के लिए हिंदू पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।
धार्मिक और खगोलीय दृष्टि से यह व्यवस्था पंचांग और ऋतुओं के संतुलन को बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कैसे पड़ा ‘पुरुषोत्तम मास’ नाम?
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। अन्य महीनों की तरह इसका कोई अधिपति नहीं था। इससे दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा।
कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने इसे अपना संरक्षण देते हुए “पुरुषोत्तम मास” नाम दिया। तभी से यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसे अत्यंत पुण्यदायी अवधि के रूप में देखा जाता है।
पूजा-पाठ और दान का बढ़ जाता है महत्व
धार्मिक ग्रंथों में अधिक मास को आत्मिक उन्नति और साधना का विशेष समय बताया गया है। इस दौरान जप, तप, व्रत, दान और भगवान विष्णु की आराधना को कई गुना अधिक फलदायी माना जाता है।
मान्यता है कि इस महीने में किए गए धार्मिक कार्यों का पुण्य सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। यही वजह है कि श्रद्धालु इस अवधि में भक्ति, ध्यान और आत्मचिंतन पर विशेष ध्यान देते हैं।
आध्यात्मिक साधना का विशेष समय
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार अधिक मास सांसारिक इच्छाओं से दूरी बनाकर आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का अवसर माना जाता है। यही कारण है कि इस पूरे महीने में भगवान विष्णु की पूजा, कथा, भजन और दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है।



