
यूपी पंचायत चुनाव में बड़ा बदलाव, पहली बार ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’ से तय होगा OBC आरक्षण
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनाव इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रहे हैं। ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी आरक्षण ‘ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला’ के तहत तय किया जाएगा। इसके लिए योगी सरकार ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। सोमवार को हुई कैबिनेट बैठक में आयोग के गठन पर मुहर लगाई गई।
सरकार का दावा है कि इस बार पंचायत चुनावों में आरक्षण प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और कानूनी मानकों के अनुरूप होगी। इससे पहले वर्ष 2021 के पंचायत चुनावों में केवल रैपिड सर्वे के आधार पर ओबीसी आरक्षण तय किया गया था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत नई व्यवस्था लागू की जा रही है।
क्या है ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला
ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया कानूनी पैमाना है। शीर्ष अदालत ने साल 2010 में ‘के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ’ और फिर 2021 में ‘विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में इस व्यवस्था को अनिवार्य बताया था।
इसके तहत राज्य सरकार को आरक्षण लागू करने से पहले तीन अहम शर्तें पूरी करनी होती हैं।
पहला टेस्ट: समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन
राज्य सरकार को एक विशेष आयोग बनाना होता है, जो स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की स्थिति, प्रभाव और सामाजिक परिस्थितियों का गहन अध्ययन करे। आयोग जमीनी स्तर पर जाकर अनुभवजन्य आंकड़े जुटाता है।
दूसरा Test: आरक्षण का वैज्ञानिक निर्धारण
आयोग द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर ही यह तय किया जाता है कि किस स्थानीय निकाय में ओबीसी आरक्षण का कितना प्रतिशत होना चाहिए। बिना वैज्ञानिक अध्ययन और सामाजिक आंकड़ों के आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता।
तीसरा Test: 50 प्रतिशत की सीमा
इस फॉर्मूले की सबसे अहम शर्त यह है कि किसी भी ग्राम पंचायत, ब्लॉक या जिला पंचायत में एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को मिलाकर कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
क्यों जरूरी पड़ा यह नया फॉर्मूला
सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि शिक्षा और नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए दिया जाने वाला आरक्षण दोनों अलग विषय हैं। स्थानीय निकाय चुनावों में राजनीतिक पिछड़ेपन को साबित करने के लिए सरकार के पास ताजा और ठोस आंकड़े होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला लागू किया गया है, ताकि आरक्षण का लाभ सही वर्ग तक पहुंचे और चुनाव प्रक्रिया कानूनी चुनौती से बची रहे।
कानूनी प्रावधान यह भी कहता है कि यदि कोई राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी किए बिना चुनाव कराती है, तो ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी मानकर चुनाव कराना होगा।
जून तक पूरी होंगी आयोग में नियुक्तियां
शासन स्तर से मिली जानकारी के अनुसार, समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल छह महीने का रखा गया है। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति मई के अंत या जून के पहले सप्ताह तक पूरी होने की संभावना है।
आयोग उन क्षेत्रों में नए सिरे से सर्वे भी कराएगा, जहां पिछड़ा वर्ग से जुड़े सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर पंचायत चुनावों में आरक्षण की नई रूपरेखा तैयार की जाएगी।
पंचायत चुनावों की तैयारियों को मिलेगी रफ्तार
सरकार के इस फैसले को पंचायत चुनावों की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि आयोग के गठन के बाद लंबे समय से लंबित ओबीसी आरक्षण का रास्ता साफ होगा और पंचायत चुनाव कराने की प्रक्रिया तेज हो सकेगी।



