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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कम अटेंडेंस वाले छात्र नहीं दे सकेंगे परीक्षा; दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम उपस्थिति को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कम अटेंडेंस वाले छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिए कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन और नियमित उपस्थिति से समझौता नहीं किया जा सकता।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि कम अटेंडेंस की वजह से नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज सहित कई संस्थानों की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। कोर्ट ने कानून के छात्रों द्वारा क्लास बंक कर कैंपस में घूमने की प्रवृत्ति पर भी कड़ी नाराजगी जताई।

दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के विवादित आदेश के पैराग्राफ 249 के प्रभाव और उसके अमल पर तत्काल रोक लगा दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश आगे से लागू होगा। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है।

दरअसल, लॉ कॉलेजों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी किया।

‘फ्री पास’ बन सकता था हाई कोर्ट का आदेश

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश छात्रों को अनुशासनहीनता और क्लास में अनुपस्थित रहने के लिए बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से शैक्षणिक संस्थानों में उपस्थिति नियमों का महत्व खत्म हो जाएगा।

इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने भी चिंता जताते हुए कहा कि छात्र हाई कोर्ट के आदेश को क्लास में न जाने के लिए “फ्री पास” की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।

क्या था दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला?

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि किसी भी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज, यूनिवर्सिटी या संस्थान में पढ़ने वाले छात्र को न्यूनतम उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता। साथ ही उसे आगे की पढ़ाई या करियर में प्रगति से भी वंचित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर अब शीर्ष अदालत ने अंतरिम रोक लगा दी है।

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