BHU के वैज्ञानिकों की बड़ी कामयाबी, अब सिर्फ यूरिन टेस्ट से होगी कैंसर की पहचान; सस्ती जांच तकनीक पर काम तेज

कैंसर की पहचान को लेकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बड़ी वैज्ञानिक सफलता हासिल की है। अब जिस कैंसर की जांच के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन और सिस्टोस्कॉपी जैसी महंगी प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ती थी, उसकी पहचान केवल यूरिन के सैंपल से संभव हो सकेगी।
बीएचयू के वैज्ञानिकों ने यूरिन में मौजूद एक्सोसोमल माइक्रोआरएनए नामक विशेष बायोमार्कर की खोज की है, जिसकी मदद से न सिर्फ कैंसर का पता लगाया जा सकेगा, बल्कि उसकी स्टेज और गंभीरता का भी आकलन किया जा सकेगा।
वैज्ञानिक अब भविष्य में प्रेग्नेंसी टेस्ट किट की तर्ज पर कैंसर जांच किट विकसित करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं।
महंगी जांच की जगह सस्ता और आसान विकल्प
फिलहाल यूरिनरी ब्लैडर कैंसर यानी यूरिन की थैली के कैंसर की पहचान के लिए मरीजों को एमआरआई, सीटी स्कैन और सिस्टोस्कॉपी जैसी जांच करानी पड़ती है, जिन पर 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च हो जाता है। इसके बावजूद कई मामलों में रिपोर्ट पूरी तरह सटीक नहीं होती।
इसी चुनौती को देखते हुए बीएचयू के विज्ञान संस्थान के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और आईएमएस बीएचयू के यूरोलॉजी विभाग ने संयुक्त रूप से शोध शुरू किया।
शोध के दौरान कैंसर मरीजों और स्वस्थ लोगों के यूरिन सैंपल की तुलना की गई।
नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक से मिली सफलता
वैज्ञानिकों ने नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग तकनीक की मदद से पाया कि कैंसर मरीजों के यूरिन में माइक्रोआरएनए की संख्या और विविधता सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जैसे-जैसे ट्यूमर बढ़ता है, माइक्रोआरएनए के स्तर में भी बदलाव आता है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि ये बायोमार्कर न केवल कैंसर की पहचान में उपयोगी हैं, बल्कि बीमारी की गंभीरता समझने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित जर्नल नेचर स्प्रिंगर में प्रकाशित हुआ है।
90 प्रतिशत से ज्यादा संवेदनशीलता का दावा
शोध के प्रमुख अन्वेषक डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि तीन माइक्रोआरएनए के संयोजन वाले पैनल ने 90 प्रतिशत से अधिक संवेदनशीलता दिखाई है।
उन्होंने कहा कि केवल यूरिन के सैंपल से कैंसर की पहचान भविष्य में जांच प्रक्रिया को अधिक सरल, तेज और रोगी-अनुकूल बना सकती है।
डॉ. सिंह के अनुसार, माइक्रोआरएनए आधारित यह तकनीक कैंसर की पहचान के साथ-साथ उसके विकास और व्यवहार को समझने में भी मदद करेगी, जिससे बेहतर इलाज रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी।
250-300 रुपये में हो सकेगी जांच
सह-प्रमुख अन्वेषक और यूरोलॉजिस्ट डॉ. ललित कुमार ने कहा कि यह खोज कैंसर निदान के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।
उन्होंने बताया कि जहां वर्तमान जांच में 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च होते हैं, वहीं इस नई तकनीक से भविष्य में केवल 250 से 300 रुपये में जांच संभव हो सकती है।
उन्होंने कहा कि यह अध्ययन बड़े स्तर पर मल्टी-सेंटर रिसर्च के लिए मजबूत आधार तैयार करता है और भविष्य में इसे क्लिनिकल डायग्नोसिस में शामिल किए जाने की संभावना है।
इन वैज्ञानिकों ने निभाई अहम भूमिका
इस शोध में स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के डॉ. समरेन्द्र कुमार सिंह के साथ यूरोलॉजी विभाग के डॉ. ललित कुमार, डॉ. गरिमा सिंह, डॉ. अनिल कुमार और सृष्टि भट्टाचार्य की अहम भूमिका रही।



