अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस : प्रकृति और विकास के बीच संतुलन की वैश्विक पहल

नई दिल्ली ( दस्तक डेस्क) : प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता सदियों पुराना है। जंगल, पहाड़, नदियां, समुद्र और वन्यजीव मानव जीवन के आधार हैं। प्रकृति हमें हवा, पानी, भोजन और जीवन के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराती है। लेकिन विकास और आधुनिकता की दौड़ में मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है। नतीजतन जंगलों की कटाई, प्रदूषण, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का विनाश और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले चुकी हैं। इससे जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन भी बिगड़ रहा है। ऐसे में प्रकृति के संरक्षण और विकास के बीच तालमेल बनाना समय की बड़ी जरूरत है। इसी उद्देश्य से हर साल 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस मनाया जाता है। यह दिवस संदेश देता है कि प्रकृति का संरक्षण और मानव विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व यानी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र ऐसे प्राकृतिक इलाके हैं, जहां जैव विविधता के संरक्षण के साथ स्थानीय समुदायों की सामाजिक और आर्थिक जरूरतों का भी ध्यान रखा जाता है। इनमें जंगल, पहाड़, नदियां, झीलें और समुद्री क्षेत्र शामिल होते हैं। इनका उद्देश्य दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों की रक्षा के साथ प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना मानव विकास को बढ़ावा देना है। इसी सोच के तहत यूनेस्को ने वर्ष 1971 में ‘मैन एंड द बायोस्फीयर’ (एमएबी) कार्यक्रम शुरू किया था, जिसका उद्देश्य प्रकृति और मनुष्य के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना तथा सतत विकास को प्रोत्साहित करना था। वर्ष 1976 में पहले बायोस्फीयर रिजर्व को मान्यता मिली। बाद में यूनेस्को ने 2021 में अपने 41वें महासम्मेलन में 3 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय बायोस्फीयर रिजर्व दिवस घोषित किया। पहली बार यह दिवस 2022 में मनाया गया।

तीन क्षेत्रों में बंटी है संरक्षण की व्यवस्था :
बायोस्फीयर रिजर्व की व्यवस्था वैज्ञानिक आधार पर तीन क्षेत्रों में विभाजित है। पहला कोर क्षेत्र है, जो सबसे संवेदनशील और संरक्षित हिस्सा होता है। यहां दुर्लभ वन्य जीवों, वनस्पतियों और प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा की जाती है तथा मानवीय गतिविधियां प्रतिबंधित या सीमित रहती हैं। दूसरा बफर क्षेत्र है, जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वैज्ञानिक शोध, शिक्षा, प्रशिक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की निगरानी की अनुमति होती है। तीसरा ट्रांजिशन क्षेत्र है, जहां स्थानीय समुदाय खेती, पशुपालन, हस्तशिल्प और अन्य आजीविका संबंधी गतिविधियां करते हैं। यहां सतत विकास को बढ़ावा देकर लोगों की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम रखने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार यह व्यवस्था संरक्षण, शोध और विकास में संतुलन स्थापित करती है।
भारत में जैव विविधता का अनमोल खजाना :
भारत प्राकृतिक विविधता के लिहाज से दुनिया के समृद्ध देशों में शामिल है। हिमालय, पश्चिमी घाट, सुंदरबन के मैंग्रोव वन, रेगिस्तान और समुद्री क्षेत्र इसकी प्राकृतिक विरासत को विशेष पहचान देते हैं। देश में कुल 18 बायोस्फीयर रिजर्व हैं, जिनमें से 13 यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में शामिल हैं। वर्ष 1986 में स्थापित नीलगिरि देश का पहला बायोस्फीयर रिजर्व है, जो तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में फैला है। यहां हाथी, बाघ, नीलगिरि तहर और शेर जैसी पूंछ वाले मकाक पाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल का सुंदरबन मैंग्रोव वनों और रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध है। इसके वन समुद्री तूफानों और तटीय कटाव से बचाव करते हैं। उत्तराखंड का नंदा देवी दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियों और हिम तेंदुए का आवास है, जबकि गल्फ ऑफ मन्नार प्रवाल भित्तियों और समुद्री जीवों के लिए महत्वपूर्ण है। नोकरेक, मानस, सिमलीपाल, पचमढ़ी, कंचनजंगा, अगस्त्यमलाई, ग्रेट निकोबार, अचनकमार-अमरकंटक, पन्ना और शीत मरुस्थल अन्य प्रमुख रिजर्व हैं। वर्ष 2025 में कोल्ड डेजर्ट को यूनेस्को के विश्व नेटवर्क में शामिल किया गया। यह हिम तेंदुए और ठंडे रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में अहम है।



