
नई दिल्ली: देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की आर्थिक स्थिति को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में क्षेत्रीय दलों की कुल आय में 51 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर इन दलों के खर्च में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली, जिससे कई दलों का वित्तीय संतुलन बिगड़ गया है।
रिपोर्ट में 36 क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के ऑडिट खातों का विश्लेषण किया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2024-25 में इन दलों की कुल आय घटकर 1,192.94 करोड़ रुपये रह गई, जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 में यही आय 2,463.17 करोड़ रुपये थी। यानी एक साल के भीतर करीब 1,270 करोड़ रुपये की गिरावट दर्ज की गई।
आय से ज्यादा हुआ राजनीतिक दलों का खर्च
रिपोर्ट के अनुसार आय में भारी कमी आने के बावजूद राजनीतिक दलों के खर्च में कोई खास कमी नहीं आई। 36 क्षेत्रीय दलों का कुल खर्च 1,433.07 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो उनकी कुल आय से करीब 240 करोड़ रुपये अधिक है। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में खर्च में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि विश्लेषण में शामिल 36 में से 21 राजनीतिक दलों ने अपनी घोषित आय से अधिक खर्च किया। इससे क्षेत्रीय दलों की आर्थिक प्रबंधन क्षमता और वित्तीय अनुशासन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
पांच बड़े क्षेत्रीय दलों का कायम रहा दबदबा
ADR की रिपोर्ट के मुताबिक देश के शीर्ष पांच क्षेत्रीय दलों का आर्थिक प्रभाव अब भी काफी मजबूत बना हुआ है। इन पांच दलों की हिस्सेदारी कुल आय का करीब 69 प्रतिशत और कुल खर्च का 77 प्रतिशत से ज्यादा रही। इससे साफ है कि क्षेत्रीय राजनीति में कुछ बड़े दलों का वर्चस्व वित्तीय स्तर पर अभी भी कायम है।
कई बड़े दल समय पर नहीं दे सके ऑडिट रिपोर्ट
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि देश के 67 मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों में से 31 दल तय समय सीमा के भीतर अपनी ऑडिट रिपोर्ट जमा नहीं कर पाए। चुनाव आयोग ने सभी क्षेत्रीय दलों को 31 अक्टूबर 2025 तक ऑडिट रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दिए थे, लेकिन 27 मई 2026 तक भी कई दलों ने अपने दस्तावेज जमा नहीं किए।
ऑडिट रिपोर्ट समय पर जमा न करने वाले प्रमुख दलों में DMK, शिवसेना, शिवसेना (UBT), नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस शामिल हैं।
ADR के मुताबिक केवल 15 राजनीतिक दलों ने तय समय सीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट जमा की, जबकि 21 दलों ने दो दिन से लेकर 96 दिन तक की देरी की। रिपोर्ट ने राजनीतिक दलों की वित्तीय पारदर्शिता, जवाबदेही और चुनावी फंडिंग व्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।



