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कस्टडी में हिंसा पुलिस की ड्यूटी नहीं, अपराध है; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज अर्जी खारिज की

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में लोगों को बार-बार पीटने और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के आरोपी पुलिसकर्मियों को आरोपों से बरी करने की मांग वाली अर्जियां खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कस्टडी में की गई इस तरह की हिंसा को पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता, बल्कि यह अपराध है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने पुलिसकर्मी शिवानी जोशी समेत दो अन्य की अर्जियों पर यह आदेश दिया।

कोर्ट ने पाया कि हिरासत में लोगों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर उन्हें उल्टा लेटाया गया और बार-बार पीटा गया। मामला बांदा जिले के बबेरू थाने से जुड़ा है। आरोपित पुलिसकर्मियों ने ट्रायल कोर्ट के 27 सितंबर 2024 के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी डिस्चार्ज अर्जियां खारिज कर दी गई थीं।

धारा 197 के तहत सुरक्षा का तर्क भी नहीं माना

याचियों ने दलील दी थी कि कथित घटनाएं सरकारी ड्यूटी के दौरान हुईं, इसलिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई से पहले मंजूरी जरूरी थी। हाईकोर्ट ने आरोपों और चोटों की प्रकृति को देखते हुए इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने डिस्चार्ज अर्जियां खारिज करने में कोई गलती नहीं की है। हाईकोर्ट ने दोनों अर्जियों को ठोस आधार से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।

नोटिस देने गई पुलिस टीम पर मारपीट का आरोप

मामले के अनुसार थाने में आईपीसी की धारा 147, 323, 504 और 506 के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। जांच के दौरान सब-इंस्पेक्टर दिलीप कुमार मिश्र ने आरोपियों का सहयोग लेने के लिए सीआरपीसी की धारा 41ए के तहत नोटिस जारी किए।

नोटिस की तामील कराने के लिए चार कांस्टेबलों को पडरी गांव भेजा गया था। अभियोजन पक्ष के मुताबिक, वहां आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों ने पुलिसकर्मियों के साथ गाली-गलौज और मारपीट की। नोटिस फाड़ने या छीनने, ईंट-पत्थर चलाने और कांस्टेबल सुखबीर सिंह का मोबाइल छीनने का भी आरोप लगाया गया।

इसके बाद गांव में पुलिस बल भेजा गया। 13 मई 2022 की रात चार महिलाओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि अगले दिन एक मुखबिर समेत चार पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिसकर्मियों पर गैरकानूनी मारपीट, छेड़छाड़, कस्टडी में हिंसा, लूटपाट और झूठे मुकदमे में फंसाने के आरोप लगाए।

शिकायत पर आदेश होने के बाद याचियों समेत नौ नामजद और कई अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।

मेडिकल रिपोर्ट में कई चोटों का जिक्र

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों की मेडिकल रिपोर्ट भी देखी। रिपोर्ट में कूल्हों, जांघों, पैरों, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट और सूजन का उल्लेख था।

कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि थाने में पुलिस कस्टडी के दौरान शिकायतकर्ता समेत कई लोगों को बार-बार पीटा गया। आरोप है कि उनके हाथ-पैर रस्सी से बांधकर पेट के बल लेटाया गया और कूल्हों, जांघों तथा पिंडलियों पर विशेष रूप से वार किए गए।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की हिंसा को पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

गिरने से चोट लगने की पुलिस की दलील को बताया बेतुका

रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता को गिरफ्तारी के दौरान जमीन पर गिरने से खून बहने वाली चोट लगी थी, जबकि तीन अन्य लोगों को कुंद वस्तु से चोटें आई थीं। पुलिस की ओर से यह स्पष्टीकरण दिया गया कि गिरफ्तारी के दौरान चारों के गिरने से उन्हें खून बहने वाली चोटें आई होंगी।

हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को बेतुका बताया। कोर्ट ने गौर किया कि ट्रायल कोर्ट ने सभी आठ घायल लोगों की मेडिकल बोर्ड से जांच कराने का आदेश दिया था, जिससे उनकी चोटों की वास्तविक स्थिति सामने आई।

कोर्ट ने कहा कि अगर मेडिकल बोर्ड से जांच नहीं कराई जाती तो रिकॉर्ड में केवल पुलिस की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट रहती और घायल लोगों के खिलाफ हुए अपराध का पता चलने की संभावना खत्म हो जाती।

धारा 354 के आरोप में मंजूरी जरूरी नहीं

पुलिसकर्मियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 148, 323, 504, 452, 354 और 395 के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी और ट्रायल कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया था। हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 197(1) के स्पष्टीकरण का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी लोक सेवक पर आईपीसी की धारा 354 के तहत अपराध का आरोप हो तो अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी की जरूरत नहीं होती।

कोर्ट ने यह भी देखा कि याचियों ने पहले हाईकोर्ट में संज्ञान और सम्मन के आदेश को चुनौती दी थी। हालांकि, सक्षम अदालत में पेश होने और उचित जमानत अर्जी दाखिल करने की अनुमति लेने के बाद उन्होंने वह अर्जी वापस ले ली थी।

इसके बावजूद उन्होंने ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया और न ही डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने से पहले जमानत हासिल की। हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों में धारा 197 के तहत सुरक्षा मांगने वाली उनकी डिस्चार्ज अर्जियों को विचार योग्य नहीं माना।

अंत में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश की पुष्टि कर दी, जिसमें पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज अर्जियां खारिज की गई थीं। दोनों याचिकाएं भी खारिज कर दी गईं।

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