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भारत पर अल नीनो का बढ़ता खतरा, सूखे से महंगाई और पानी की किल्लत तक बढ़ सकती हैं मुश्किलें; 2027 पर नजर

नई दिल्ली: दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार दिल्ली से अपने सामान्य समय 25 सितंबर से दो दिन पहले ही लौट गया। राजधानी से मानसून की यह पिछले 24 वर्षों में सबसे जल्दी वापसी है। इससे पहले 2002 में मानसून 20 सितंबर को ही दिल्ली से विदा हो गया था। इस साल मानसून 2 जुलाई को दिल्ली पहुंचा और करीब 83 दिनों तक सक्रिय रहा। 2012 के बाद यह दिल्ली में मानसून की सबसे कम अवधि रही।

हालांकि, दिल्ली में इस बार बारिश सामान्य से ज्यादा हुई। सफदरजंग में 1 जून से 23 सितंबर के बीच 728.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 629.7 मिलीमीटर है। यानी राजधानी में सामान्य से 16 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। इसके विपरीत देश के कई हिस्सों में बारिश की स्थिति कमजोर रही। मेघालय में सामान्य से करीब 60 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई।

अब मौसम वैज्ञानिकों की चिंता तेजी से मजबूत हो रहे अल नीनो को लेकर है। आशंका जताई जा रही है कि इसका व्यापक असर वर्ष 2027 में दिखाई दे सकता है। भारत में इसके कारण कम बारिश, सूखा, गर्म सर्दी, खाद्य महंगाई और अगले साल गर्मियों में पानी की कमी जैसी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

तेजी से मजबूत हो रहा अल नीनो

प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में विकसित हो रहा अल नीनो इस साल असामान्य गति से मजबूत हो रहा है। फिलहाल यह शुरुआती चरण में है, लेकिन नवंबर से जनवरी के बीच इसके चरम पर पहुंचने की आशंका है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने सितंबर की शुरुआत में जारी अपडेट में इसकी तीव्रता बढ़ने और इसके प्रभाव के 2027 तक बने रहने की चेतावनी दी है।

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम को प्रभावित करती है। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन सकती है, जबकि अन्य जगहों पर सूखे और जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है। बढ़ते तापमान के बीच जलवायु परिवर्तन इसके प्रभाव को और गंभीर बना सकता है।

समुद्र के तापमान में भी तेजी से बढ़ोतरी

अल नीनो की निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नीनो 3.4 सूचकांक के अनुसार मई से जुलाई के बीच प्रशांत महासागर के संबंधित क्षेत्र का समुद्री सतह तापमान सामान्य से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक था। मध्य अगस्त तक यह अंतर बढ़कर 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

अल नीनो की स्थिति आम तौर पर तब घोषित की जाती है, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो। दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा की असामान्यता को अत्यंत तीव्र अल नीनो की स्थिति माना जाता है। सितंबर के मध्य तक तापमान में असामान्यता तीन डिग्री सेल्सियस से अधिक होने का दावा किया गया है।

आशंका है कि 2026-27 का अल नीनो 2015-16 और 1997-98 जैसे अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो वर्षों के स्तर को भी पार कर सकता है।

भारत में मानसून और खेती पर असर

जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून सीजन में 26 सितंबर तक 50 वर्षों के औसत की तुलना में करीब 12 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। देश के लगभग 38 प्रतिशत हिस्से में 20 प्रतिशत या उससे अधिक बारिश की कमी रही।

कम बारिश का असर कृषि क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा है। धान, कपास, गन्ना और मक्का जैसी फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। इससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। कर्नाटक और महाराष्ट्र पहले ही अपने स्तर पर सूखे की घोषणा कर चुके हैं। आने वाले समय में दूसरे राज्यों में भी ऐसी स्थिति बनने की आशंका है।

कम बारिश से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा

बारिश की कमी का असर खाद्य कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है। अगस्त में खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति जनवरी के 2.13 प्रतिशत के निचले स्तर से बढ़कर 5.95 प्रतिशत पहुंच गई।

उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल की तुलना में चावल, चीनी, सूरजमुखी तेल और प्याज की खुदरा कीमतों में क्रमशः 7.5 प्रतिशत, 21 प्रतिशत, 19 प्रतिशत और 101 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अगर बारिश की कमी और कृषि उत्पादन पर दबाव बना रहता है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।

सूखे के बाद गर्मी और पानी का संकट बढ़ने की आशंका

अल नीनो का असर केवल मानसून तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। कम बारिश के कारण जलाशयों में पानी का स्तर घट सकता है और मिट्टी में नमी की कमी अगले फसल चक्र को प्रभावित कर सकती है। इसके बाद गर्म सर्दी और अगले साल समय से पहले शुरू होने वाली तेज गर्मी पानी की समस्या को और गंभीर बना सकती है।

2015-16 के अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो के दौरान भी भारत के कई हिस्सों में सूखे की गंभीर स्थिति बनी थी। उस समय सूखाग्रस्त इलाकों तक पानी पहुंचाने के लिए भारतीय रेलवे की सेवाओं का इस्तेमाल करना पड़ा था।

पानी और चारे की कमी के साथ गर्मी का असर पशुधन पर भी पड़ सकता है। इससे पशुओं की मृत्यु दर बढ़ने और दूध उत्पादन घटने की आशंका है। इसका असर दूध और अन्य प्रोटीन उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

अगले छह महीनों में 15,800 अतिरिक्त मौतों का अनुमान

शिकागो विश्वविद्यालय की क्लाइमेट इम्पैक्ट्स लैबोरेटरी की 23 सितंबर की रिपोर्ट में अल नीनो और बढ़ते तापमान के स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव को लेकर चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अगले छह महीनों में गर्मी की लहर से जुड़ी करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। 2027 की गर्मियों के आगे बढ़ने के साथ यह संख्या और बढ़ने का अनुमान जताया गया है।

रबी फसलों पर भी पड़ सकता है असर

आने वाले महीनों में कृषि क्षेत्र के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। अक्टूबर-नवंबर में शुरू होने वाली रबी फसलों की बुवाई के दौरान जलाशयों में सामान्य से कम पानी, मिट्टी में नमी की कमी और गर्म सर्दी का असर पड़ सकता है।

गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका है। अगर अगले साल गर्मी जल्दी शुरू होती है और कटाई से पहले तापमान तेजी से बढ़ता है तो गेहूं की पैदावार पर गंभीर असर पड़ सकता है।

2022 में मार्च-अप्रैल के दौरान रिकॉर्ड गर्मी की लहर ने गेहूं के उत्पादन को प्रभावित किया था। इसके बाद भारत को गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। मौजूदा परिस्थितियों में ऐसे संभावित कदमों को लेकर कृषि और खाद्य नीति के स्तर पर तैयारी की जरूरत बढ़ सकती है।

इथेनॉल मिश्रण नीति के सामने भी चुनौती

अल नीनो का असर भारत की इथेनॉल मिश्रण नीति के लिए भी चुनौती बन सकता है। चीनी, मक्का और चावल इथेनॉल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण फसलें हैं। बारिश की कमी से इनके उत्पादन पर दबाव और कीमतों में तेजी आने की स्थिति में खाद्य जरूरतों तथा जैव ईंधन की मांग के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।

इस तरह आने वाले महीनों में अल नीनो का असर केवल मौसम तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतों, पानी की उपलब्धता, पशुधन और स्वास्थ्य से लेकर ऊर्जा नीति तक इसके प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। वर्ष 2027 की गर्मियों तक इसकी वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होने की संभावना है।

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