
उत्तराधिकारी की तलाश में मायावती का नया दांव, ‘माया’ को अपनी ‘छाया’ पर ज्यादा भरोसा; ईशान को आगे बढ़ाने के क्या हैं मायने?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सीटों के लिहाज से शून्य पर चल रही बहुजन समाज पार्टी में विधानसभा चुनाव से पहले सबकुछ ठीक नहीं दिख रहा है। पार्टी प्रमुख मायावती के हालिया फैसलों ने समर्थकों और संगठन के भीतर भी असमंजस बढ़ा दिया है। बड़े भतीजे आकाश आनंद को तीन बार जिम्मेदारी से हटाने और फिर पार्टी से बाहर करने के बाद अब छोटे भतीजे ईशान को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में मायावती की राजनीतिक विरासत और उत्तराधिकारी को लेकर चल रही कवायद पर सबकी नजर है।
कांशीराम के बाद बसपा की कमान संभालने वाली मायावती करीब 23 वर्षों से पार्टी की सबसे बड़ी नेता बनी हुई हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उनके सामने राजनीतिक उत्तराधिकारी का सवाल लगातार अहम होता जा रहा है। आकाश आनंद को बार-बार मौका देने के बाद अब ईशान को आगे करना इस तलाश का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, मायावती की विरासत आखिर किसके हाथों में जाएगी, इसे लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है।
आकाश के ससुर को राजनीति से हटाने के बाद भतीजे पर भी कार्रवाई
विधानसभा चुनाव से पहले बसपा में परिवार के भीतर की यह राजनीतिक कवायद कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मायावती ने आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीतिक संन्यास लेने के लिए कहा और इसके बाद आकाश को चौथी बार पार्टी से पूरी तरह बाहर कर दिया।
एक ओर आकाश को ससुर समेत पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, तो दूसरी ओर ईशान को संगठन की अगली कतार में लाया गया। इसे मायावती की भविष्य की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि मिशन-2027 में ईशान की भूमिका अभी शुरू ही हुई है, लेकिन आकाश की राजनीतिक पारी को पूरी तरह खत्म मानना भी जल्दबाजी होगी। मायावती पहले उन्हें तीन बड़े मौके दे चुकी हैं। ऐसे में भविष्य में उन्हें एक और मौका मिलने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि मायावती एक साथ दो मोर्चों पर काम कर रही हैं। एक तरफ वह संगठन में अपने फैसलों को लेकर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहती हैं, वहीं दूसरी तरफ आकाश और ईशान दोनों को लेकर पार्टी पदाधिकारियों के बीच अलग-अलग तरह की राजनीतिक जमीन तैयार हो रही है।
मायावती के भरोसेमंद रहे कई बड़े नेता बाद में हुए दूर
मायावती के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं को लेकर उनका रुख हमेशा चर्चा में रहा है। कभी उनके बेहद करीबी रहे कई कद्दावर नेता समय के साथ बसपा से बाहर हो गए।
इन नेताओं में गया चरण दिनकर, आरके चौधरी, स्वर्गीय डॉ. सोनेलाल पटेल, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, इंद्रजीत सरोज और स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई नाम शामिल हैं। ये नेता कभी मायावती के बेहद नजदीकी माने जाते थे, लेकिन समय के साथ एक-एक कर पार्टी से अलग होते गए।
ऐसे में ईशान को आगे बढ़ाने का फैसला सिर्फ परिवार के भीतर उत्तराधिकारी चुनने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसके जरिए मायावती संगठन में अपनी पकड़ बनाए रखते हुए भरोसेमंद नेतृत्व की तलाश को भी आगे बढ़ा रही हैं।
क्या ईशान बन पाएंगे बसपा का नया युवा चेहरा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि ईशान मायावती की उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं। पार्टी की परंपरा के मुताबिक पदाधिकारी उन्हें स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन असली चुनौती संगठन से बाहर होगी।
दलित और पिछड़े वर्ग के युवा मतदाताओं के बीच अपनी पहचान बनाना ईशान के लिए आसान नहीं होगा। मिशन-2027 के दौरान दूसरे राजनीतिक दल भी युवा चेहरों और खासतौर पर जेन-जी मतदाताओं को साधने के लिए अपनी रणनीति तैयार करेंगे। ऐसे में ईशान के सामने न सिर्फ पार्टी की विरासत को संभालने, बल्कि बदलते युवा मतदाता वर्ग के बीच बसपा की जमीन मजबूत करने की चुनौती होगी।



