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न मोबाइल, न मौसम ऐप… फिर भी मानसून की विदाई भांप लेते थे बुजुर्ग, कांस के सफेद फूल देते थे बड़ा संकेत

सागर: मानसून के मौसम में प्रकृति हर तरफ हरियाली से भर जाती है। खेत-खलिहान फसलों से लहलहाने लगते हैं और पेड़-पौधों पर खिलने वाले फूल वातावरण को खूबसूरत बना देते हैं। लेकिन ग्रामीण जीवन में प्रकृति की यही वनस्पतियां मौसम में बदलाव के संकेत भी देती रही हैं। बुंदेलखंड में इन दिनों खेतों की मेड़ों और आसपास कांस की घास पर सफेद फूल दिखाई देने लगे हैं। स्थानीय बुजुर्गों की मान्यता है कि कांस में फूल आना मानसून के कमजोर पड़ने और बारिश के धीरे-धीरे विदा होने का संकेत है।

कभी मौसम का पूर्वानुमान जानने के लिए न मोबाइल फोन थे, न इंटरनेट और न ही आज जैसी मौसम संबंधी सुविधाएं। ऐसे समय में ग्रामीण प्रकृति में होने वाले बदलावों को देखकर आने वाले मौसम का अंदाजा लगाते थे। कांस में फूल आना भी इन्हीं पारंपरिक संकेतों में शामिल रहा है।

कांस के फूल देखकर बारिश का लगाया जाता था अनुमान

सागर की 70 वर्षीय द्रोपती बाई के मुताबिक, पुराने समय में बुजुर्ग पेड़-पौधों और दूसरी प्राकृतिक गतिविधियों में होने वाले बदलावों पर नजर रखते थे। इन्हीं संकेतों के आधार पर बारिश के आगे के दौर का अनुमान लगाया जाता था।

उनका कहना है कि बुंदेलखंड में हल षष्ठी के अवसर पर मिट्टी की गाय-भैंस बनाकर टिशु के पत्तों और कांस की घास के साथ पूजा करने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसी दौरान कांस की घास पर आने वाले फूलों को देखकर बारिश के शेष दौर के बारे में भी अनुमान लगाया जाता रहा है।

द्रोपती बाई बताती हैं कि यदि कांस में फूल नहीं आए हों तो इसे आगे अधिक बारिश की संभावना से जोड़ा जाता है। वहीं, जब कांस में सफेद फूल खिलने लगते हैं तो माना जाता है कि बारिश अब धीरे-धीरे कम होगी। इसके बाद कई जगहों पर रुक-रुककर या अलग-अलग हिस्सों में बारिश होने की संभावना मानी जाती है।

सफेद फूलों के साथ लाल दाने भी माने जाते हैं संकेत

स्थानीय मान्यता में केवल कांस के सफेद फूल ही नहीं, बल्कि उसके साथ दिखाई देने वाले छोटे लाल दानों को भी मौसम के मिजाज से जोड़कर देखा जाता है। द्रोपती बाई के अनुसार, यदि सफेद फूलों के साथ लाल दाने भी नजर आने लगें तो इसे खंड-खंड में बारिश होने का संकेत माना जाता है।

ग्रामीण बुजुर्गों के लिए प्रकृति में होने वाले ऐसे बदलाव लंबे समय तक पारंपरिक मौसम संकेतक का काम करते रहे हैं। कांस में फूल आने का समय आम तौर पर मानसून के करीब तीन महीने पूरे होने के आसपास माना जाता है। यही वजह है कि इसके फूलों को मानसून की विदाई से जोड़कर देखा जाता रहा है।

रामचरितमानस में भी मिलता है कांस के फूलों का उल्लेख

प्रकृति के बदलावों के जरिए मौसम को समझने की परंपरा को काफी पुराना माना जाता है। द्रोपती बाई के अनुसार, तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में भी कांस के फूलों का उल्लेख मिलता है।

मान्यता के अनुसार, सीता जी के हरण के बाद श्रीराम और लक्ष्मण उनकी खोज के दौरान प्रवर्षण पर्वत की गुफा में रहते हैं। इसी दौरान श्रीराम लक्ष्मण को वर्षा ऋतु के समाप्त होने और शरद ऋतु के आगमन के बारे में बताते हैं। इसी प्रसंग में कांस की घास पर खिलने वाले सफेद फूलों को वर्षा ऋतु के वृद्ध होने के संकेत के रूप में देखा गया है।

सागर में औसत से काफी कम बारिश, किसानों की बढ़ी चिंता

सागर जिले में इस साल अब तक करीब 32 इंच बारिश दर्ज की गई है, जबकि जिले में औसत बारिश लगभग 48 इंच मानी जाती है। ऐसे समय में खेतों और मेड़ों पर कांस की घास में बड़े-बड़े सफेद फूल दिखाई देने लगे हैं। इसे लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है।

किसानों को आशंका है कि यदि बारिश का निर्धारित आंकड़ा पूरा नहीं हुआ तो आगामी रबी सीजन की खेती प्रभावित हो सकती है। पर्याप्त बारिश नहीं होने पर सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है।

हालांकि कांस के फूलों से मौसम का अनुमान लगाना वैज्ञानिक पूर्वानुमान नहीं, बल्कि बुजुर्गों से चली आ रही पारंपरिक मान्यता है। इसके बावजूद ग्रामीण जीवन में प्रकृति के संकेतों को पहचानने और उनसे मौसम के बदलाव को समझने की यह परंपरा आज भी कायम है।

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